ये क्या हुआ

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दिव्या सिंह, स्वतंत्र पत्रकार और लेखिका, नोएडा

ये क्या हुआ?
ये क्यों हुआ?
खरीद और बेचने का सिलसिला
ये किसने था शुरू किया?

वो कौन था कि जिसके रोब से,
वो कौन था कि जिसके ख़ौफ से
क़लम के ताजदार बिक गए,
विचार के विचार बिक गए।

ना कोई सरपरस्त है,
जो है वो खुद ही पस्त है,
वो पस्त होकर मस्त है।

मगर वो उसकी साज़िशें,
वो ख़्वाहिशों पे ख़्वाहिशें
कि देखते ही देखते
दयार के दयार बिक गए,
क़लम के ताजदार बिक गए।

क़लम थी जिनकी बस ज़ुबाँ,
जो थे क़लम का आसमाँ
ना जाने आज हैं कहाँ!
कोई उन्हें बुलाओ तो,
कहाँ हैं उनको लाओ तो!

नक़द थे या उधार बिक गए…
क़लम के ताजदार बिक गए।

20 thoughts on “ये क्या हुआ

    1. वाकई काबिले तारीफ जितना भी कहा जाए कम है आप बहुत अच्छा लिखती हैं

      Rekha Pandey 🙏🏻♥️

    1. अति सुंदर शब्द लिखती है दिया जी
      रेखा पांडे ,,

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