
दिव्या सिंह, स्वतंत्र पत्रकार और लेखिका, नोएडा
ये क्या हुआ?
ये क्यों हुआ?
खरीद और बेचने का सिलसिला
ये किसने था शुरू किया?
वो कौन था कि जिसके रोब से,
वो कौन था कि जिसके ख़ौफ से
क़लम के ताजदार बिक गए,
विचार के विचार बिक गए।
ना कोई सरपरस्त है,
जो है वो खुद ही पस्त है,
वो पस्त होकर मस्त है।
मगर वो उसकी साज़िशें,
वो ख़्वाहिशों पे ख़्वाहिशें
कि देखते ही देखते
दयार के दयार बिक गए,
क़लम के ताजदार बिक गए।
क़लम थी जिनकी बस ज़ुबाँ,
जो थे क़लम का आसमाँ
ना जाने आज हैं कहाँ!
कोई उन्हें बुलाओ तो,
कहाँ हैं उनको लाओ तो!
नक़द थे या उधार बिक गए…
क़लम के ताजदार बिक गए।
शानदार
आभार महोदया
Aabhar
बहुत ही खूब
Thanks rekha ji
वाकई काबिले तारीफ जितना भी कहा जाए कम है आप बहुत अच्छा लिखती हैं
Rekha Pandey 🙏🏻♥️
Thanks madhu ji
वाह 👌
आभार महोदया
Aabhar anjum ji
Ye aapka badappan hai
Shukriya anjum ji
Wah
Shukriya sir
अति सुंदर शब्द लिखती है दिया जी
रेखा पांडे ,,
शुक्रिया मैं दिव्या हूँ रेखा जी
Very well said…bahoot khoob 👍
Thanks ali ji
Beautifully written !
शानदार..