
माधुरी द्विवेदी,प्रसिद्ध लेखिका, कानपुर
मेरी यायावरी
ने मुझे अनवरत पथगामी,
व्योम का वासी
बना दिया…
ना पल भर चैन पाता मन,
स्मृतियों का इतिहास रचता है।
क्षणभंगुर जीवन में
नित नये आकाश
गढ़ता है।
पल में जा बैठता
वृक्ष की ऊँची फुनगी पर,
एक मधुर राग बन इतराता है।
दूजे पल तेज़ हवा का झोंका
कर जाता है तंद्रा भंग,
फिर यथार्थ की ज़मीं पर
आ धड़ाम गिर जाता है!
हर क्षण उठती है एक मृदुल तरंग,
हर पल अकुलाई फिरती है
शब्द-घाट के कूलों पर।
वो नंगे पाँव विचरती है,
चुनती है मोती स्वर्ण-नवल,
तभी एक नया काव्य रच पाता है।
माधुरी जी , आपने अपने मन और विचारों की मृदुल तरंगों की यायावरी का बेहद कोमल चित्रण किया है ।
बधाई ।