
मोनिका शर्मा ‘मासूम ‘प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली
उड़े पतंग वो कैसे, कि जिसमें डोर नहीं,
बिना घटा के कभी, नाचता है मोर नहीं।
तू ही मुक़ाम है मेरा, तू ही मेरी मंज़िल,
चुनूँ मैं राह वो कैसे, जो तेरी ओर नहीं।
न जाने ख़्वाहिशें कितनी दबाए बैठा है,
कहा ये किसने कि चलता है दिल पे ज़ोर नहीं।
अदब है लाज़िमी, महफ़िल है ये अदीबों की,
सुख़न की शम्मअ जलाओ, मचाओ शोर नहीं।
कोई नज़रें, तो कोई दिल चुराए बैठा है,
बताओ कौन वो “मासूम” है, जो चोर नहीं।
बहुत सुंदर रचना
कोई नज़रें, तो कोई दिल चुराए बैठा है,
बताओ कौन वो “मासूम” है, जो चोर नहीं
बहुत अर्थपूर्ण रचना मोनिका जी
कोई नज़रें, तो कोई दिल चुराए बैठा है,
बताओ कौन वो “मासूम” है, जो चोर नहीं
बहुत अर्थपूर्ण फचना
शब्द बिंम्ब के साथ प्यारी रचना