
दिव्या सिंह, प्रसिद्ध लेखिका, नोएडा
कासे कहूं, कुछ कही नहीं जाती
महंगाई, अब तो सही नहीं जाती।
धरम से ऐसा बांध दिया है,
कौन जन्म का बदला लिया है।
ऐसा है कुछ, जो कही नहीं जाती,
महंगाई, अब तो सही नहीं जाती।
मोटर तो मोरे पल्ले में कब थी,
भिंडी खरीदी तो वो भी गजब थी।
अब बिन बताए, सही नहीं जाती,
महंगाई, अब तो सही नहीं जाती।
क्या मैं कहूं, मोरा चौका है सूना,
बिन तेल के मोरा दुःख आज दूना।
ये बात, लेकिन कही नहीं जाती,
महंगाई, अब तो सही नहीं जाती।
कासे कहूं, कोउ पूछे तो बोलूं,
ना कोउ पूछे, तो मुख काहे खोलूं।
चुप रहके, बिपदा कही नहीं जाती,
महंगाई, अब तो सही नहीं जाती।
वाह
Shukriya madhu ji
Wah
Bahut umda hai… Mahngaai