
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज पुणे
मेरे पिता एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे, लेकिन सामान्य शिक्षक नहीं वे उन दुर्लभ शिक्षकों में से थे, जो मुंशी प्रेमचंद की कहानियों के पात्रों की तरह ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ थे. गरीबी और तंगहाली के बावजूद उन्होंने अपने विद्यार्थियों को हमेशा पहले रखा. उनकी पूरी सेवा डेलवास, खारुआकला और कसारी में ही बीती, और हम बच्चों के लिए उनका जीवन और संघर्ष हमेशा जीवित अनुभव रहे.
मैं आज भी याद करता हूँ खारवा के कांकाणी सर, राज साहब, आइवन सर, रतनसिंह जी, मन्नालाल जी गुप्ता और उन सभी शिक्षकों को जिनकी तनख्वाह कम थी लेकिन ज्ञान और आत्मसम्मान कूट-कूट कर भरे थे. ऐसे शिक्षक अब दुर्लभ ही रह गए हैं.इस कहानी का केंद्रबिंदु है बाबूजी की हाथ घड़ी.
बात उन दिनों की है जब मैं चौथी क्लास में पढ़ रहा था. पिताजी का तबादला खारुआ से कसारी हो गया. तब हमारे पास पैसे नाममात्र ही थे. पिताजी की तनख्वाह उस समय सिर्फ 144 रुपए थी. घर का सारा खर्च उधारी पर ही चलता था. घर का सामान बैलगाड़ी में शिफ्ट करना था. उसमें मां के कपड़े और थोड़े गहने, पिताजी के कपड़े और सरकारी कागजात, एक बिस्तर और बर्तन बस इतना ही. सब तैयार था, लेकिन पिताजी बैलगाड़ी में बैठने से पहले एक चिंता का सामना कर रहे थे. उनके राशन वाले सेठ को 60 रुपए बाकी थे. बिना उस कर्ज को चुकाए पिताजी कसारी नहीं जाना चाहते थे. तभी उनकी आँखों में एक चमक आ गई. उन्होंने कुछ दिन पहले सुनहरे डायल वाली हैनरी सैंडो घड़ी खरीदी थी. यह घड़ी उनकी शान और सहेजने की आदत का प्रतीक थी. रविवार को अक्सर वह घड़ी साफ करने में घंटों बिताते. लेकिन उस दिन, उनकी पहली प्राथमिकता सेठ का उधार चुकाना थी. उन्होंने अपनी प्रिय घड़ी महज 60 रुपए में बेच दी, ताकि कर्ज चुका कर पूरा परिवार सुरक्षित बैलगाड़ी में बैठ सके.
कसारी पहुँचने के बाद भी, बाबूजी ने किसी और घड़ी को कभी उसी तरह नहीं चाहा. हमने उन्हें बाद में कई एचएमटी ऑटोमैटिक, रिको, सिको और टाइटन की घड़ियाँ दीं, लेकिन उनका मन हमेशा हैनरी सैंडो घड़ी में उलझा रहा. शायद यह घड़ी नहीं, बल्कि उस दिन की मजबूरी और अपने परिवार के लिए किए गए बलिदान की याद थी, जो उनके दिल में हमेशा जिंदा रही. वास्तव में, यह कहानी केवल एक घड़ी की नहीं है. यह कहानी कर्तव्य, त्याग और परिवार के लिए बेइंतहा प्यार की है. वह घड़ी हमेशा हमें याद दिलाती रही कि असली मूल्य किसी वस्तु में नहीं, बल्कि उस वस्तु को त्यागने की भावना में होता है.
सुन्दर यादें।
. हमारे पिता के जैसे आदर्श अगर हममे
थोडे भी आ गऐ तो हमारा जीवन सफल हो जाऐ। यह पिता का स्वाभिमान है जो गलत नही करता किसी के साथ।
आज आपने इस कहानी के माध्यम से बहोत सुंदर संदेश है भावी पिढी के लिए क्यो कि आज का मानव खुद के लिए ही जीता है।
पढ़कर ऐसा लगा जैसे कोई फिल्म देख रही हूं। बेशकीमती यादें
आदरणीय मधुजी
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मार्मिक
दिल को छू जाने वाला लेख। अपने बच्चों लिए माता पिता के त्याग और समर्पण की कोई सीमा नहीं होती और उनके ऋण को चुकाने की क्षमता बच्चों में नहीं होती।
दिल को छू जाने वाला लेख। अपने बच्चों लिए माता पिता के त्याग और समर्पण की कोई सीमा नहीं होती और उनके ऋण को चुकाने की क्षमता बच्चों में नहीं होती।
बहुत सुंदर रचना ,मन को छू गई