” बाऊजी “

अंजू ओझा, प्रसिद्ध लेखिका, पटना

बाऊजी को रिटायर हुए पंद्रह साल हो गए हैं। देखते-देखते समय का पहिया घूमता जा रहा है। पिछले साल ही माँ चल बसीं। पापा की ज़िंदगी माँ के बिना वीरान-सी हो गई थी, इसलिए उन्हें दिल्ली से बंबई लेकर आ गया मैं। दिल्ली के नोएडा में तीन कमरों का बड़ा-सा फ्लैट है . बड़ी-सी बालकनी भी, जहाँ पापा ने माँ के लिए झूला लगवाया था।

अब पापा मुंबई में हैं, तो मैं उनके लिए हर काम तत्परता से करता रहता हूँ। हर महीने शुगर-बीपी की दवाइयाँ ले आता, मौसमी फल और ड्राय फ्रूट्स, काजू, किशमिश, बादाम रख देता, ताकि उनका बूढ़ा शरीर सेहतमंद रहे। फिर भी पापा उदास और गुमसुम लगते।

मेरी वाइफ निशा कहती रहती -“आप बाऊजी को अपने पास रख रहे हैं, पर उनका मन दिल्ली वाले घर में बसता है।
चाहे आप कितना भी कर लो, उन्हें हमारा घर बेटा-बहू का लगेगा, उनका नहीं।”

“क्या बकवास कर रही हो? यह घर भी पापा का ही है! समझीं? आइंदा ऐसी फिज़ूल बात मत करना,” -तंज कसते हुए मैंने कहा।मुझे लग रहा था कि निशा को पापा का रहना पसंद नहीं, पर मैं अपने ही दिमाग को झटक देता. शायद मैं ही गलत सोच रहा हूँ।खैर… पापा सुबह वॉक पर जाते और लौटकर गरम दूध और सैंडविच खाते।पापा के आते ही निशा डाइनिंग टेबल पर उनका दूध और सैंडविच ले आती। मेरे लिए भी दूध लाती थी। मैं पापा का दूध पीने लगा तो चौंक गया —

“अरे! ये दूध है या उजला पानी? निशा, ये कैसा पानी जैसा दूध दिया है?”निशा सकपका गई। मुझे समझ आ गया . पापा के दूध में पानी मिलाया जाता था, और मुझे दिया जाता था शुद्ध दूध।

बाऊजी के सामने मैं लज्जित हो गया।

पापा ने संभालते हुए कहा -“कोई बात नहीं बेटा, बहू मेरे सेहत का ख्याल रखती है।”

“नहीं पापा… आज आपका दूध नहीं पीता तो यह जालसाज़ी कैसे पता चलती?”
मेरा मन खिन्न हो गया। निशा के चेहरे पर कोई भाव नहीं.बेहयाई की भी हद होती है।

“जाने भी दो बेटा… मेरा फ्लाइट का टिकट करा दो। मैं दिल्ली चला जाता हूँ। यहाँ मेरा जी नहीं लगता।”
पापा की आवाज़ में दर्द साफ़ सुनाई पड़ा और अगले ही दिन वो दिल्ली चले गए।

वहाँ पहुँचकर बाऊजी आज़ाद पंछी की तरह रहने लगे।
माँ की स्मृतियों से भरा वह घर उन्हें फिर से जीवंत कर रहा था।
उन्होंने खानसामा रख लिया. तरह-तरह के व्यंजन का आनंद लेते।

वीडियो कॉल पर बताते -“आज आलू परांठा खाया… कभी गोभी परांठा… आज नवरत्न पुलाव।”
उनके चेहरे की प्रसन्नता मुझे भी खुश कर देती। मैं महीने में एक बार दिल्ली हो आता, ताकि बाप-बेटा मिलकर मस्ती कर सकें।

निशा से बात नहीं करता मैं। मौन-व्रत में हूँ। बस औपचारिकता भर रह गई है हम दोनों के दरम्यान। जिस दिन उसे आत्मग्लानि होगी, उस दिन अहंकार की दीवार ढह जाएगी।

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