बचपन की दीवाली : यादों की मिठास

मधु चौधरी, लेखिका बोरीवली (मुंबई)

बचपन में दीवाली का अपना ही अलग मज़ा था. लगभग एक महीना या बीस दिन पहले से ही घर में हलचल शुरू हो जाती थी. हम लोग बिरला कॉलोनी में रहते थे, और कंपनी की तऱफ से घर की पुताई कराई जाती थी.
पुताई से पहले घर खाली करना किसी बड़े खेल से कम नहीं होता था. हम सभी बच्चेछह भाई-बहनों का संयुक्त परिवारजोश-जोश में सब सामान बाहर बगीचे में बनी तख्त पर डाल देते थे. वहां, धूप में रखे गद्दों पर लोटना, कूदना, और फिर उन्हें मोटे डंडे से पीटनाइसमें मज़ा ऐसा कि हँसी और शोर के बीच समय का पता ही नहीं चलता था. शाम तक धूप की गर्मी से गद्दे फूलकर दोगुने हो जाते और उनका मज़ा अपने चरम पर पहुँच जाता.
सफाई के बाद, जब सब कुछ वापस घर में रख दिया जाता, तब पापा कभी-कभी बाहर से कुछ स्वादिष्ट लेकर आते. हमारे लिए वह छोटी-सी पार्टी होती, जिसमें हर चीज़ में बचपन की मासूमियत और उत्साह झलकता.
उस समय त्योहारों का आनंद कुछ अलग ही था. आज की तरह जब मन किया, वह बना लिया या बाहर से ऑर्डर कर लियाऐसा नहीं होता था. केवल त्योहार के दिन ही मिठाई और नाश्ते बनते थे. मेरी मम्मी और चाची मिलकर दो-तीन दिन पहले से तैयारी करतींभुजिया, चिवड़ा, मठरी, बेसन और नारियल की ब़र्फी, गुझिया, नमकीन, कांजी के बड़े ये सब मारवाड़ी घरों की परंपरा और प्यार की मिसाल थे. हमारी कॉलोनी में 80% लोग मारवाड़ी थे और हर घर में त्योहार की खुशियाँ उसी खास तरीके से मनाई जाती थीं.
लेकिन सबसे यादगार हिस्सा थापापा का हाथ का फ्रूट क्रीम. दिवाली पूजन के बाद पापा इसे बनाना शुरू करते. मम्मी सारे फल काट कर रखतीं, और पापा की अपनी एक खास स्टाइल थी, जिसमें किसी का हाथ नहीं लग सकता था. हमें केवल फल साफ करने का काम मिलता. उस स्वादिष्ट क्रीम का जादू आज भी मेरी यादों में ताज़ा है5 स्टार होटल या किसी और जगह का स्वाद उस मिठास को कभी नहीं पा सका.
वो समय, जब नए कपड़े और सामान सिर्फ दिवाली पर ही मिलते थे, और इंतजार में पूरा साल बीत जाता, उसकी मिठास आज की सुविधा भरी दुनिया में खो सी गई है. अब हम जब चाहे बाजार जाकर खरीद लेते हैं या ऑनलाइन ऑर्डर कर लेते हैं, लेकिन वह उत्सुकता, वह इंतजार, वह खुशीवह सब कहीं खो सा गया है.
दूसरे दिन से ही आने-जाने वालों का तांता लगा रहता. कभी हम किसी के घर जाते, कभी कोई हमारे घर आता. दो-तीन दिन तक यह सिलसिला चलता. अब इसे ङ्गङ्घगेट-टुगेदरफफ कह दिया गया है, और वह भी अब घर में नहीं, बल्कि होटल में आयोजित किए जाते हैं.कहाँ से शुरू होकर कहाँ तक आ गए हैं हम? क्या वह बचपन की मासूम खुशियाँ अब भी लौट सकती हैं? शायद नहीं. लेकिन इन यादों की मिठास और बचपन की दीवाली की झलक हमारे दिल में हमेशा जिंदा रहेगी.

One thought on “बचपन की दीवाली : यादों की मिठास

  1. असली दीपावली का आनंद परिवार के साथ आता है और अब परिवार तो बचा ही नहीं है 🙏

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *