रेखा बचपन से ही कल्पनाओं में जीने वाली लड़की थी. स्कूल के दिनों में जब और लड़कियाँ गुड़ियों से खेलती थीं, तब रेखा अपने पुराने कॉपियों में कहानियाँ लिखा करती थी कभी राजकुमारियों की, कभी पेड़ों से बात करते बच्चों की, तो कभी एक ऐसी माँ की, जो आसमान से अपने बच्चे को देखती थी. उसके शब्दों में जादू था, और हर पंक्ति में एक सच्चाई.
समय बीतता गया. पढ़ाई पूरी हुई, शादी हो गई, बच्चे हुए्. ज़िंदगी के पन्नों पर कहानियाँ अब उसकी नहीं रहीं वो अब बच्चों के होमवर्क, सब्ज़ी की लिस्ट और स्कूल के नोट्स से भर गए्. लिखने की आदत जैसे किसी पुराने संदूक में बंद हो गई थी, जिस पर अब धूल जम चुकी थी.एक दिन, उसकी पुरानी सहेली सीमा का फोन आया. बातें करते-करते सीमा ने कहा, रेखा, तू कुछ लिख क्यों नहीं लेती? तेरे जैसे लिखने वाले बहुत कम होते हैं.
रेखा हँस दी वो हँसी जिसमें थकान भी थी और अधूरी ख्वाहिशें भी.क्या लिखूं सीमा? अब तो सोचने का भी वक़्त नहीं रहता.लेकिन सीमा का एक वाक्य उसके ज़ेहन में बैठ गया
तू अपने लिए नहीं, मेरे लिए लिख….
उस रात रेखा सो नहीं पाई. उसने कई सालों बाद अपनी अलमारी से वो पुरानी कॉपी निकाली जिसमें कुछ अधूरी कहानियाँ थीं, कुछ सूखे फूल, और कुछ पन्ने जो अब भी उसकी स्याही का इंतज़ार कर रहे थे.
उसने एक पेन उठाया और लिखा-
एक औरत, जिसका नाम सुंदर-था आठ बच्चों की माँ, और एक सरकारी स्कूल की अध्यापिका वह दिखने में साधारण थी, पर उसका मन बेहद खूबसूरत था. कहानी बहती चली गई.
रेखा ने पाया कि उसके अंदर की लेखिका अभी मरी नहीं थी वो बस सो गई थी, कुछ सालों के लिए. अगले दिन रेखा ने सीमा को कहानी भेजी. सीमा ने पढ़ते ही जवाब भेजा. रेखा, तूने सिर्फ लिखा नहीं, मुझे रुला दिया…उस दिन के बाद रेखा ने तय किया अब चाहे जो हो, वो रोज़ थोड़ा-थोड़ा लिखेगी. न किसी अखबार के लिए, न प्रसिद्धि के लिए बस अपने लिए और उन लोगों के लिए जो उसे पढ़कर खुद को महसूस करते हैं. कभी-कभी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत शुरुआत वहीं से होती है, जहाँ हम सोचते हैं कि सब कुछ खत्म हो गया है.
फिर से… सिर्फ अपने लिए