निर्लज्ज…

मौसमी चंद्रा, प्रसिद्ध लेखिका

रिनी ने पीछे पलटकर देखा। वो अभी भी उसे ही देख रहा था। गुस्से से रिनी के गाल गर्म हो गए।
“कैसा बेशर्म है! हे भगवान आपने भी कैसे-कैसे निर्लज्ज लोग बनाकर भेज दिए हैं धरती पर!”
बड़बड़ाती हुई रिनी सीढियां चढ़ने लगी।

रोज का गुस्सा था ये! हर सुबह रिनी का खून ऐसे ही जलता! कभी-कभी मन में आता बस हटाकर कोई प्राइवेट वैन ठीक कर दे पर नयी जगह है जमने में थोड़ा वक्त तो लगेगा।

उसके पति ग्रामीण बैंक में क्लर्क थे। इतना पिछड़ा गांव जहाँ बच्चों को ले जाकर रहने का सोचा भी नही जा सकता था। तबादले के लिए जोर आजमाइश चल रही थी।
पहले परिवार किराए के घर में था जो शहर के बीचोंबीच पड़ता था। लेकिन जैसे ही बिल्डर ने उनका फ्लैट हैंडओवर किया, रिनी “अपना घर..होम स्वीट होम” के मोहपाश में बंधी इस वीराने में रहने चली आयी।
उसके अपार्टमेंट के पहले दो और अपार्टमेंट थे जो निर्माणाधीन थे। सारे दिन खटर-पटर की आवाज़ें।
करीब दो दर्जन से अधिक मजदूर रात-दिन लगे रहते। रात में उसी अधबनी इमारत में पसर जाते।

रिनी को अपने काम से मतलब रहता था बाकी दुनिया में क्या हो रहा उससे कम। जरूरत की चीज़ें केवल रविवार को खरीदी जाती जब उसके पति आते।  सिर्फ स्कूल बस के लिए दो बार उतरती बाकी समय घर में लॉक!
कभी कोई परेशानी नहीं हुई..लेकिन हर सुबह जब रिनी बस के लिए उतरती, एक जोड़ी निर्लज्ज नज़रें उसे घूरती रहती।
काला-कलूटा, खाकी कमीज-पतलून, मोटी सी नाक और सिर पर गिने-चुने बाल..उफ़्फ़…! भद्दी सी शक़्ल उसपर हथेली पर खैनी मलते हुए इस अधेड़ का यूँ घूरना!
रिनी किसी तरह बर्दास्त करती!

“आज भी अगर देखा तो पक्का कम्प्लेन करूँगी स्कूल में! 15 दिन से देख रही हूं इसे! अब नहीं! बहुत हो गया ..”
भनभनाती हुई रिनी बस के पास पहुंची तो देखा ड्राइवर ख़ुद बाहर खड़ा था। वो निर्लज्ज लापता था।
  सुकून भरी सांस ली और होठों के रास्ते बाहर छोड़ दिया।
बच्चे को बिठाकर वो लौटने लगी पर बस खुलने की आवाज़ नहीं आयी। पलटकर देखा तो ड्राइवर बाहर खड़ा उसे ही देख रहा था।
रिनी का पारा चढ़ गया। उल्टे पांव लौटी।
“क्यों भैया बस क्यों नही चला रहे?”

“आप जाओ न दीदी! फिर करते हैं स्टार्ट।”
दीदी सम्बोधन ने आग में घी का काम किया।

अभी वो जहरबुझा सा कुछ कहने ही वाली थी कि…
“वो रघु भैया बोलकर गए हैं जब आप अपने बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़ जाओ तभी बस स्टार्ट करना। अकेली इतनी सुबह,उसपर आगे वाली बिल्डिंग में इतने मजदूर… सेफ नहीं है न।”

“तो इसलिए रघु मुझे घूरता था।”

“न जी उनकी नज़रें घूरती नहीं हैं.. निगरानी करती है! वो क्या है न …जबसे उनकी बेटी के साथ…फिर उसने आत्महत्या कर ली! तब से वो डरते हैं कि ऐसा हादसा और किसी बेटी के साथ न हो…”
मेरी आँखें पश्चाताप से गीली हो गई। भारी कदमों से सीढ़ियों तक पहुंची। चढ़ने से पहले पलटकर देखा… बस घरघराकर चल पड़ी थी।

2 thoughts on “निर्लज्ज…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *