सुन स्त्री स्त्री होने का गर्व दिखाया कर
जहाँ दिल लगे वहां पर दिल लगाया कर
कभी आईना देख़ ख़ुद हीं मुस्कुराया कर
दुनियाँ के ताम झाम से ख़ुद क़ो बचाया कर.
होता जो भी मुश्किल से मुश्किल हल कर लेती
सुन, स्त्री है तो स्त्री होने का गर्व दिखाया कर.
तुमसे उम्मीद तुमसे आशाएं है इन बात से दूर
अपनी आँखों में भी कभी डूब जाया कर…
है तुझको भी खुल कर हॅसने बोलने का हक़
अपने पे अपने होने का अधिकार जताया कर…
पाबंदी के उलझनों में ख़ुद क़ो ना उलझाया कर
सुन, स्त्री हो तो स्त्री होने का गर्व दिखाया कर..
समेट कर घर क़ी हर बिखरी चीजों क़ो ऱख
कभी अपनी बिखरी जुल्फों क़ो सुलझाया कर.
दुनियां क़ी भीड़ में एक तेरी मुस्कान प्यारी है
ऐसा आईंने में देख़ कभी तो मुस्कुराया कर.
हिम्मत हौसलों और प्यार से भरी तुम स्त्री
सुन, स्त्री हो तो स्त्री होने का गर्व दिखाया कर…

खुशी झा, प्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई