नया साल

रेणु परसरामपुरिया, लेखिका, मुंबई

आज है विदाई की बेला,
2025 की विदाई।
विदा करने की जिम्मेदारी है मेरी,
मैं चाहता हूँ यह विदाई यादगार हो-
चलो, चलते हैं।

चलते-चलते रास्ते में
2026 से मुलाकात हो ही गई।
2026 ने पूछा-
“छोड़ने जा रहे हो?”
मैंने कहा-
“हाँ, जा तो रहा हूँ।”
उसने फिर पूछा-
“पर छोड़ोगे कैसे?”

मैंने 2025 की ओर देखा।
2025 बोला—
“मुझे क्यों देख रहे हो?
मैं तो जाना ही नहीं चाहता।
तुम मुझे जबरदस्ती विदा कर रहे हो।
मैं तो तुम्हारे साथ ही रहना चाहता हूँ।
तुम बहुत अच्छे हो,
मुझे तुम्हारा साथ पसंद है।”

हर रोज़ एक नई शरारत
चाहे वह हत्या हो,
बलात्कार हो,
विमान या रेल दुर्घटना,
आगजनी हो
या युद्ध की विभीषिका।

तुमने मानवजाति को
बर्बादी के मुहाने पर
खड़ा कर रखा है।
मेरे पास 365 दिनों के
हर एक पल का हिसाब है।

उसने 2026 की ओर
ईर्ष्या भरी दृष्टि से देखा,
फिर मुझे घूरते हुए बोला-
“तुम इसके साथ मिलकर भी
यही सब शरारतें करोगे न?”

कुछ सोचते हुए कहा-
“तुम्हारी तो फितरत ही है
धोखा देने की।”

उसने एक गहरी साँस ली,
मेरा हाथ 2026 के हाथों में दिया
और चला गया-
अनंत में विलीन होने।

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