
अर्चना वर्मा सिंह, प्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई
जरा चालाकियाँ दुनिया की माना कम समझते हैं
मगर राहों की हर दुश्वारी पेच ओ खम हो समझते हैं।
समझते हैं जहां में हमको जो भी कम समझते हैं
जो पत्थर काट दे खुद को वो शीशा हम समझते हैं।
भले विज्ञान हो या खेल हो या हो कोई भी क्षेत्र
नहीं हैं हम किसी से कम यही दमखम समझते हैं।
पुराने खत सँभाले आज भी रक्खी हूॅं क्यूँ कर ही
चले जब दिल पे नश्तर तो इन्हें मरहम समझते हैं।
रकीबों की बनी फेहरिस्त हैरत में हूॅं तब से ही
वही निकले मेरे दुश्मन जिन्हें हमदम समझते हैं।
सुनो गर इश्क़ है तो बात दिल की खुल के कह डालो
निगाहों की लिखावट हम जरा मद्धम समझते हैं।
नहीं अब ‘अर्चना’ से पूछना मज़हब है क्या उसका
सभी धर्मों से ऊँचा मुल्क का परचम समझते हैं।
वाह बेहतरीन ग़ज़ल