“तुम्हारे खतों का पुलिंदा”

पल्लवी गर्ग, प्रसिद्ध लेखिका, कानपुर

तुम्हारे खतों का पुलिंदा जो

रख छोड़ा था संदूक में

उसमें हर बार कुछ नया दिख जाता है

एक ख़त में देर से उठने की डांट मिली

चाय के ठंडे निशान मिले

बाबा की बीमारी की चिंता दिखी

दूसरे में तुम्हारी छुटकी की गुड़िया की मुस्कान थी

टीचर की डांट

हवा से बात करती तुम्हारी बाइक की रफ्तार मिली

किसी में चोट के निशान मिले

जो मेरी खिड़की से कूदते वक्त लगी थी तुम्हें

शीशा मिला जिसे चमका, इशारे करते थे

एक में कान की बाली मिली जो

तुम्हारे स्वेटर में अटक गई थी उसे रात

एक सूखी सी पत्ती भी लिपट दिखी

जिससे सहलाया था तुमने मेरा हाथ

एक ख़त उड़ा रहा है तुम्हारे पसंदीदा सेंट की खुशबू

एक में पहला चुंबन की तपिश है

पहली तकरार की मिठास भी

एक ख़त है में है दो नाम – बच्चों के

एक में,

तुम्हारे पापा की तुमसे ना मिलने की

सख्त हिदायत मिली

और मिली मेरी

उनसे गुहार की दरकार

एक ख़त जो बरसों से ढूंढ रही हूं

आज भी नहीं मिला

जिसमें तुमने वादा जड़ा था कि

हम, एक रोज मिलेंगे

4 thoughts on ““तुम्हारे खतों का पुलिंदा”

  1. बहुत ही शानदार तरीके से शब्द पिरोते हैं आपने पल्लवी जी। बधाई हो

  2. बेहतरीन रचना। किसी भी विधुर या विधवा के लिये बहुत हृदयस्पर्शी एहसास।.
    शुभकामनाएं। शानदार कलम कारी के लिये

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