
सुविद्या करमरकर, प्रसिद्ध लेखिका, पुणे
तुम्हारा–मेरा प्रेम
सदा अनकहा,
आँखों की गहराइयों में ठहरा
शब्द… शब्दों से भी गहरा।
तुम्हारा–मेरा प्रेम
निःस्वार्थ भावना का स्वर—
एक को लगे जो घाव,
दूसरे को उतनी ही पीड़ा।
तुम्हारा–मेरा प्रेम
मोगरे की सुगंध-सा,
मन में सहेजा हुआ
धीरे–धीरे फैलता।
तुम्हारा–मेरा प्रेम
आज भी अव्यक्त,
राहें भले अलग हों
पर कल भी-अभेद्य !