
झरना माथुर, प्रसिद्ध लेखिका
पल पल बढ़ते इस पल में अब, अंतर्मन से चंचल मन पूछे,
जीवन भंवर के इस मंथन में,
सुख- दुख तूने कितने देखे।
चित्त को छलती है ये माया,
सत्ता वैभव इसने दिखलाया,
इसको पाने की चाहत में ,
देखे कितने है अंधेरे।
पल पल बढ़ते इस पल में अब, अंतर्मन से चंचल मन पूछे,
रस्मों के इस फेरे में,
झूठे ऊपरी कितने मेले हैं,
समझौते की वेदी पे फिर,
अरमानों की उठती लपटें।
पल पल बढ़ते इस पल में अब, अंतर्मन से चंचल मन पूछे,
पंच तत्वों से बनती है काया,
आचरण से सजता है लबादा,
क्यों करता इसपे अहंकार तू,
हम सब माटी के है ढेले।
पल पल बढ़ते इस पल में अब, अंतर्मन से चंचल मन पूछे,