
मधु मिश्रा, प्रसिद्ध लेखिका, कोमना, नुआपड़ा, ओडिसा
हमारे देश के बड़े बड़े शहरों के होटलों में ज़ीरो नाइट के लिए हर साल भव्य आयोजन किया जाता है I ऐसे आयोजनों में कुछ लोग सपरिवार होते हैं, वहीं कुछ लड़के और लड़कियों के ग्रुप अत्याधुनिक कपड़ों में शामिल होते हैं I ऐसी अधिकांश जगहों में एक ओर बड़े बड़े लॉन और हॉल में बाक़ायदा स्टेज प्रोग्राम में भड़कीले और जोशीले गीत चलते रहते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ उपस्थित मेहमानों के लिए खाने और पीने की बाकायदा व्यवस्था से शाम रंगीन होती रहती है I इन होटलों की महीनों पहले से ही एडवांस बुकिंग शुरु हो जाती है I मतलब इस नाइट का भरपूर मज़ा लेने के लिए लोगों का दिमाग़ पहले से ही तैयार होता है I
कहना ये है कि.. कि ऐसे कार्यक्रम तो हर साल ही होते रहे हैं, तो फ़िर इस साल ऐसा क्या हो गया जिसमें युवा लड़कियों ने अपनी मर्यादा की सारी हदें पार कर दी! समझ में ही नहीं आया कि ये पुरुषों से कैसी बराबरी की गई है! जबकि पुरुषों का भी नशा करना कोई पुरस्कृत करने वाला काम तो हरगिज़ नहीं है!
समझ से परे है कि ऐसा क्या हुआ, जो इन्हें नशे में मदमस्त होना पड़ा I और नशे में डूब जाने के बाद फुल स्पीड में गाड़ी चलाने की वज़ह से बहुत सी सड़क दुर्घटनाएं भी हुईं I कहीं कहीं कुछ लोग अपने हाथ पैर तुड़वा के बैठे हैं, और कहीं तो इन हादसों में किसी का बच्चा किसी का पति तो किसी की माँ बहन की मौत भी होने का समाचार मिला I
मतलब कि कुछ देर के सुख के लिए परिवार की ख़ुशियों को मटियामेट कर दिया गया I
आख़िर नशा करके इन्हें कैसा सुख मिलता है? जो इनकी आँखों में पट्टी बाँध देता है, जिसके आरपार इन्हें अपनी और अपने परिवार की मान मर्यादा तक दिखाई नहीं देती I
सोचने वाली बात तो ये है कि एक जनवरी के बाद से ही सोशल मीडिया पर जो वीडियो दिखाया जा रहा है.. उसमें लड़कियों को शराब से धुत्त बदहवास अवस्था में गिरते पड़ते हुए देखकर उनके परिवार वालों पर क्या बीत रही होगी!क्या इन्होंने शाबासी वाला काम किया है ? उल्टे इनकी वज़ह से वो सारे अभिभावक जिनके बच्चे शहर से बाहर पढ़ने और नौकरी के लिए गये हुए हैं, वो भयाक्रांत हैं…!
एक ओर जब विश्व समाज भारत की संस्कृति और सभ्यता को सम्मान की नज़रों से देखता है, पदानुसरण कर रहा है, और बड़े शौक से हमारे पहनावे हमारी संस्कृति को अपना रहा है I तो ऐसे में ये नशेबाज कुछ तथाकथित लोग अपने देश को गर्त में क्यों ले जाना चाहते हैं? आख़िर ऐसी बेहूदगी क्यों..? क्यों ये बच्चे अपने माँ बाप की नाक कटाने पर उतारू हो गये! कौन पूछेगा इनसे सवाल ?
ऐसी आधुनिकता किस काम की जिसमें अपने देश की सभ्यता को सरे आम नंगा कर दिया गया हो! समझ में नहीं आता कि ज़ीरो नाइट के नाम पर आख़िर किसका और कैसा स्वागत किया जाता है? ऐसा गिरा हुआ आचरण तो जश्न के नाम पर कलंक है I क्या इन बच्चों को एक बार भी अपने माँ बाप का चेहरा याद नहीं आया? बेचारों ने क्या इनकी बेहूदगी की पराकाष्ठा देखने के लिए अपने बच्चों को बड़ा किया होगा… शायद कभी भी नहीं!!
यदि नये वर्ष का स्वागत इस तरह से होता है तो, क्या ये अच्छा हुआ? ऐसी घटनाओं को रोके जाने के लिए सरकार को दृढ़ संकल्पित होना चाहिए I भय है कि इन पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया तो ऐसे आयोजन वर्ष में चुनिंदा दिनों के लिए नहीं बल्कि बार बार होंगे… I
इन सबके पीछे कुछ विशेष वर्ग लाभान्वित हुए होंगे, पर ऐसे लाभ से आख़िर उन्हें क्या हासिल हुआ होगा..?
ऐसा न हो कि दूसरों के लिए खोदे गये गड्ढे में कल को उनका ही बच्चा धूल धूसरित अवस्था में मिले! निश्चित रूप से ऐसे आयोजन हमारे देश की अस्मिता पर सवाल खड़े कर रहे हैं!
Fashion hai. …agar yeh nahi kiya to backward ka label lag jayega ….badalni hogi soch