
पूनम सिंह, प्रसिद्ध लेखिका, मेरठ
ड़ कंपा देने वाली सर्द रातों में,
ठंड से सिकुड़ती ज़िंदगी.
बेबस, लाचारी के चिथड़ों से
तन को ढांपती ये ज़िंदगी.
यूँ तो मिली है ज़िंदगी,
पर जीने को मोहताज है ज़िंदगी.
रात के सुनसान अंधेरों में फुटपाथ पर,
बेबसी ओढ़े, शून्य में झांकती ज़िंदगी.
ज़हर से भी ज़हरीले हालातों को पीने को
मजबूर ये ज़िंदगी.
यूँ तो मिली है ज़िंदगी,
पर जीने को मोहताज है ये ज़िंदगी.
तरह-तरह के प्रलोभनों से
वोटों के लिए लुभाई जाती है ये ज़िंदगी,
और कुर्सी मिलते ही
भुला दी जाती है ये ज़िंदगी.
यूँ तो मिली है ज़िंदगी,
पर जीने को मोहताज है ये ज़िंदगी