
डॉ. उमासिंह बघेल, प्रसिद्ध लेखिका, रीवा (मध्यप्रदेश)
ज़िंदगी कोई विरासत नहीं
जिस पर कोई अधिकार जमा ले।
ये ज़िंदगी ईश्वर का दिया आशीर्वाद ही तो है,
जिसमें जज़्बातों का मेला भरपूर है।
विचारधाराओं की पंक्तियाँ अद्भुत हैं,
अपनों की चाहत ही ज़िंदगी का नाम जो है।
ये ज़िंदगी, तू इतनी बदनाम क्यों है?
तेरा इंतज़ार इन साँसों में रहने के बराबर है।
तेरा गुमनाम होना ही बेवफ़ाई है,
तेरा सबसे रूठ जाना ही जुदाई है।
तेरी यादों को परखना ही एक एहसास है—
ये ज़िंदगी, तू मेरे कितनी पास-पास है…