
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
हमारी जवानी उस मोड़ पर आ खड़ी हुई थी, जहाँ एक दौर विदा ले रहा था और दूसरा पूरे आत्मविश्वास के साथ सामने आ रहा था. फिल्मी परदे पर राजेश खन्ना की चमक धीमी पड़ चुकी थी और अमिताभ बच्चन का उभार कस्बों तक अपनी आहट पहुँचा चुका था. वही बदलाव कपड़ों में भी दिखाई देने लगा था. बेलबॉटम पैंटें, चौड़ी मोरियाँ और चेहरे पर उगता हुआ नया एटीट्यूड.
महिदपुर रोड में उन दिनों फैशन के मायने अलग थे. जो नागदा या इंदौर हो आता, वही चलन का जानकार माना जाता. बाहर की दुनिया से लौटे लोग तय करते कि अब क्या पहना जाएगा, कैसे बाल रखे जाएंगे और कैसे चला जाएगा. हम जैसे साधारण लड़कों के लिए फैशन इतना सहज नहीं था. हमारी जवानी तो मंदसौर से हर शुक्रवार लगने वाली हाट में आने वाले टोपी वाले बा की पंद्रह रुपए की रेडीमेड निकर में ही निकल रही थी.
ऐसी निकर पहनने वालों में मैं अकेला नहीं था. राकेश कोचर, कमलेश चौधरी, अनिल पोरवाल सराफ, राकेश कांठेड़, राजाराम नवघाणे और उज्जैन में शिक्षक बने अनिल पोरवाल कई नाम थे उस साधारण क़तार में. लेकिन जो सचमुच फैशनेबल कहलाते थे, उनमें रमेश गुलाटी और सबसे ऊपर नाम आता था मुख्तियार भाई का.
मुख्तियार भाई कपड़े पहनते नहीं थे, उन्हें निभाते थे. अमिताभ बच्चन जैसी हेयर स्टाइल, वही संवाद बोलने का अंदाज़ और वही अकड़यंग एंग्री मैन का पूरा पैकेज. लेकिन उनकी पहचान थी उनकी बेलबॉटम पैंट की मोरी. इतनी चौड़ी कि कोई पैंट सिलवाने जाता तो टेलर से स़ाफ कह देता मोरी मुख्तियार भाई जितनी रखनी है.
मोरी ज़मीन से रगड़ खाती चलती थी. उसे बचाने के लिए मुख्तियार भाई ने ऐसे सैंडिल पहनने शुरू किए जो शायद पूरी तरह लकड़ी के बने होते थेजैसे जेंट्स के लिए बनाई गई हाई हील. फिर भी मोरी घिसती, तो दिमाग़ी जुगाड़ सामने आता. पैंट की मोरी के नीचे लोहे की चेन लगा दी जाती वही चेन, जो आमतौर पर बैगों में दिखती थी.
यह जुगाड़ इतना कारगर निकला कि देखते ही देखते फैशन बन गया. लोग नई पैंटों में भी चेन लगवाने लगे. वह वक्त सचमुच मुख्तियार भाई का था. लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी. बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे मियाँ भी सुभान अल्लाह निकले. मुख्यत्यार भाई के छोटे भाई शफी अहमद ने फैशन में नया प्रयोग किया. दो पुरानी पैंटों से एक शर्ट बनवाने का. यह प्रयोग भी चल पड़ा. इस हुनर में रॉयल टेलर उस्ताद साबित हुए. वे शायद उस इलाके के इकलौते टेलर थे जो दो पुरानी पैंटों से एक ढंग की शर्ट बना सकते थे. उनके यहाँ बाकायदा लाइन लगने लगी. लोग पुरानी पैंटें लेकर आते और नई शर्ट में कस्बे की शान बनकर निकलते. आज उन दिनों को याद करता हूँ तो लगता है. वह स़िर्फ कपड़ों का फैशन नहीं था. वह हमारी जवानी की पहचान थी, हमारे सपनों की बेलबॉटम, जो ज़मीन से रगड़ खाती हुई भी पूरे ठाठ से चल रही थी.
बढ़िया संस्मरण।
Bahut sunder yaade