
रीता मिश्रा, प्रसिद्ध लेखिका, भागलपुर
करवा चौथ का व्रत सभी सुहागिनें बड़ी खुशी से अपने-अपने पति की लंबी आयु के लिए रखती हैं।
चांदनी का यह पहला करवा चौथ था, और उसका पति चन्दन उसके साथ नहीं था। उनकी शादी को अभी साल भर भी नहीं हुआ था। दोनों ने साथ में ज्यादा वक्त भी नहीं बिताया था। दोनों एक-दूसरे को अच्छे से जान भी नहीं पाए थे कि हेड ऑफिस से बुलावा आ गया और चंदन को अपनी सुहागरात के चौथे ही दिन ड्यूटी पर जाना पड़ा।
चन्दन आर्मी में डॉक्टर के पद पर कार्यरत था।
चांदनी का उतरा हुआ चेहरा देख सासुमा ने उसे प्यार से समझा-बुझा कर बाजार से नई सुर्ख लाल रंग की सिल्क साड़ी और गहने, उसकी पसंद के अनुसार, खरीदवा लाई।
सुबह चार बजे सरगी खाने के लिए जागने को बोलकर सासू मां अपने कमरे में सोने चली गई।
चांदनी उदास मन से अपने पति को फोन पर शिकायत करती है, “हमारा पहला करवा चौथ है और हम… आपके बिना व्रत और पूजा कैसे करें? बताइए। चांद देखने के बाद पति को देखा जाता है। हम कैसे देखेंगे आपको, भला… जरा बताइए तो?”
“अरे यार… इसमें इतना क्या सोचना है।
हूं… बहुत सिंपल है।”
“वो कैसे?”
“टनटनाटन टनटन तारा… मोबाइल फोन!
अच्छा, अब ध्यान से सुनो। जिस वक्त चांद निकलेगा, ठीक उसी वक्त हम तुम्हें वीडियो कॉल करेंगे; तुम मुझे देख कर पूजा कर लेना… है न, बहुत सिंपल सी बात।”
चांदनी मुस्कुरा कर हां में सिर हिला दी।
“चलो फिर ठीक है, कल मिलते हैं। ऑडियो, वीडियो, अप्रत्यक्ष, प्रत्यक्ष — सब में वाय वाय, डार्लिंग।”
चन्दन अपनी मां से भी फोन पर हाल-खबर और बहुत तरह की बातें करके फोन कट कर दिया।
चांदनी चन्दन की ऑडियो-वीडियो, अप्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष जैसी शब्दावली का अर्थ समझने की भरसक कोशिश करती है, पर उसके पल्ले कुछ नहीं पड़ा और सोचते-सोचते सो गई। सरगी के लिए सुबह उठना था।
शाम को सारी सुहागिनें सज-धज कर आ गईं।
सासू मां भी मैरून सिल्क साड़ी में काफी सुंदर लग रही थीं।
सासुमा प्रतिवर्ष अपने ही घर में सभी सहेलियों और जान-पहचान वाली सुहागिनों को बुलाती हैं और करवा चौथ पूजा का सारा आयोजन करती हैं।
सब छत पर चांद के निकलने का इंतजार कर रहे थे, और चांदनी अपने दिल में बसे चांद की कॉल का…।
कुछ ही पल में चांद निकल आया। सभी सुहागिनें अपने-अपने पति के साथ पूजा कर रही थीं और चांदनी इंतजार कर रही थी।
सासू मां ने कहा, “मन उदास ना कर बेटी! मुझे पता है तुम जिसका इंतजार कर रही हो, वो भी तैयार होकर जल्दी आ जाएगा। तुम तब तक पूजा तो शुरु करो।”
पूजा करने के बाद चांदनी छलनी से चांद का दर्शन करती सोचती है, “ये क्या बात हुई! वादा किया था कि चांद निकलते ही कॉल करूंगा… मैं फोटो ही साथ ले आती तो अच्छा रहता। अब क्या करूं?” और चांद से मनुहार करती है, “हे चांददेवता! आप ही कुछ करो। आपके तो दर्शन हो गए, मेरे चांद का दर्शन कैसे करूँ? मेरा करवा चौथ व्रत कैसे पूरा होगा?”
तभी एक आंटी बोलीं, “अरे ओ चांदनी! कितना ऊपर वाले चांद को निहारोगी? अब जरा जल्दी से नीचे वाले अपने चांद को तो देख लो, कब से इंतजार कर रहा है।”
चांदनी छलनी के साथ मन से चांद को धन्यवाद करती है और सोचती है — “चलो, सही वक्त पर फोन आ गया।” जैसे ही उसने बंद आँखें खोलीं, सामने चन्दन खड़ा मुस्कुरा रहा था।
चांदनी अवाक, सब कुछ भूलकर, आंखें फाड़े उसे देखे जा रही थी।
“ओए, चन्दन की चांदनी! देखती ही रहोगी या जल्दी से पूजा भी खतम करोगी? बहुत जोर की भूख लगी है यार। कल रात के बाद से कुछ खाया नहीं।”
“तो क्या आप भी…?”
चंदन की आँखें हां कह रही थीं।
सारी महिलाएं एक साथ खिलखिला कर हँस पड़ीं।
सासू मां खुशी से भरे दिल से दोनों की बलैइयाँ ले रही थीं, “है चंद्रदेव! दोनों को किसी की नज़र न लगे, इनके बीच ऐसे ही अटूट प्यार जोड़ी बनाकर रखना।”
सब लोग उन दोनों को आशीर्वाद देकर व्रत खोलकर अपने-अपने पति के साथ घर चले गए।
चन्दन और चांदनी किधर गए, अब आप सोचिए…!
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– सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे