कल्पना

डॉ नलिनी शर्मा “कृष्ण”  अहमदाबाद

माँ… माँ, कहाँ खो गई हो?”
खिड़की से बाहर के खूबसूरत नज़ारे निहारती कल्पना को मनन ने हल्के से झंझोड़ते हुए कहा-“कब से बुला रहा हूँ, आप सुन ही नहीं रही हो। पता नहीं किस ख़यालों में खोई हुई हो। प्लीज़ माँ, एक कप चाय बना दो।”

मनन की बात सुनकर कल्पना ख्यालों की दुनिया से बाहर आई और रसोई में चाय बनाने चली गई। मनन भी उसके साथ किचन में आ गया। कुछ पल की ख़ामोशी के बाद उसने अपनी माँ का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा-“माँ, तुमने बहुत तकलीफ़ें, बहुत दुख-दर्द सहा है। पापा के जाने के बाद से तुमने सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी परवरिश के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी मजबूरी और ज़रूरत की भट्टी में झोंक दी। पर माँ, अब और नहीं। मैं तुम्हें दुख में नहीं देख सकता। अब मैं तुम्हारे दामन में सिर्फ़ खुशियाँ भरना चाहता हूँ। हर पल तुम्हें मुस्कुराते देखना चाहता हूँ।”

कल्पना की आँखें भर आईं। वह मुस्कुराकर बोली-“हाँ बेटा, मेरी तो अब एक ही ख़ुशी है कि जल्द से जल्द तेरी शादी कर दूँ और तेरा घर बस जाए, ताकि इस घर में फिर से खुशियाँ लौट आएँ। और मुझे भी सुकून से आगे की ज़िंदगी तेरे बच्चों के साथ बिताने का मौका मिले।”
फिर अचानक याद करते हुए बोली—
“अरे हाँ बेटा, तुम्हारा बेंगलुरु जाना भी तो फिक्स हो गया है। सारी तैयारियाँ हो गई हैं। बहुत खुशी की बात है कि तुम्हें इतनी अच्छी नौकरी मिली है।”

थोड़ा रुककर वह बोली-“बस, वहाँ पहुँचते ही मुझे जल्दी बुला लेना। मैं तेरे बिना ज़्यादा दिन अकेली नहीं रह पाऊँगी।”

“यस, माय डियर मॉम। बहुत जल्दी सब कुछ बहुत अच्छा हो जाएगा।”
कहते हुए दोनों ने साथ बैठकर चाय पी और हँसी-मज़ाक के कुछ अनमोल पल अपनी ज़िंदगी के पिटारे में सहेज लिए।

चार दिन बाद होली थी। कल्पना ने मनन की पसंद की सारी स्वादिष्ट चीज़ें बनाई थीं। मनन ने मुस्कुराकर कहा-
“माँ, सब कुछ है, पर एक चीज़ की कमी रह गई।”
“क्या?”
“गुजिया। मुझे गुजिया बहुत पसंद है, और आपने बनाई ही नहीं।”

“अरे हाँ!” कल्पना हँस पड़ी।
“मैं कैसे भूल सकती हूँ कि तुम्हें भी अपने पापा की तरह गुजिया कितनी पसंद है।”

“आप गुजिया बनाओ माँ, मैं थोड़ी देर में आता हूँ। और आज की होली कुछ अलग होगी, बहुत रंगीन होगी।”
कहते हुए मनन बाहर चला गया।

एक घंटे बाद जब वह लौटा, तब तक गुजिया तैयार हो चुकी थीं।
किचन में काम समेट रही कल्पना का हाथ पकड़कर मनन उसे बाहर हॉल में ले आया और बोला-“माँ, आपके लिए एक सरप्राइज़ है।”“सरप्राइज़? कैसा सरप्राइज़?”इतना कहते ही उसकी नज़र सामने खड़े एक जाने-पहचाने चेहरे पर पड़ी।
वह उसका कॉलेज का क्लासमेट रवि था। समय ने भले ही दोनों के चेहरों पर अपनी लकीरें खींच दी थीं, पर पहचान आज भी वैसी ही थी।कल्पना कुछ बोल पाती, उससे पहले ही रवि मुस्कुराते हुए बोला-
“मम्मा, मैंने आपसे कहा था न, मैं आपके दामन में अब सिर्फ़ खुशियाँ भरूँगा। और देखिए, मैं आपकी ख़ुशी को ढूँढकर ले आया हूँ। मैं जानता हूँ कि आप पापा से बहुत प्यार करती थीं, पर आपकी डायरी में आपके दोस्त रवि का ज़िक्र मैंने पढ़ा था। आपको ढूँढना मेरे लिए मुश्किल नहीं रहा।”

कल्पना और रवि एक-दूसरे को विस्मय भरी नज़रों से देखते रह गए। तभी मनन ने हँसते हुए कहा-
“अरे जी, आज होली है, और आज की होली कुछ अनोखी होनी चाहिए।”

गुलाल से भरी थाली रवि के सामने बढ़ाते हुए मनन बोला।
रवि ने गुलाल उठाया, कल्पना से अनुमति माँगी और भावुक स्वर में कहा-“वर्षों की तपस्या का फल शायद आज मिला है। मैं चाहता हूँ कि अब हमारी ज़िंदगी रंगों से भर जाए। क्या तुम मेरा साथ दोगी?”कल्पना की नज़रें झुक गईं। शरमाकर उसने पलकें मूँद लीं। उसकी यह अदा देखकर रवि को कॉलेज के दिन याद आ गए। उसने गुलाल से उसके गालों को छुआ, और वे पहले से भी ज़्यादा गुलाबी हो उठे।

3 thoughts on “कल्पना

  1. बहुत सुंदर लाजवाब कहानी लेखन की उत्कृष्टता के लिए बहुत बहुत साधुवाद 🙏🙏

  2. सचमुच बहुत ही रोचक और बेहतरीन कहानी लिखी है आपने नलिनी जी,इतनी बेहतरीन काबिले-तारीफ कहानी लिखने के लिए और हमें पढ़ने का अवसर प्रदान करने के लिए आपका तहेदिल से बहुत बहुत शुक्रिया।

  3. बहुत ही सुंदर और रोचक कहानी पढ़ने को मिली
    नलिनी सिंह जी आपका तहेदिल से बहुत बहुत शुक्रिया।

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