
शैफाली सिन्हा, लेखिका, नवी मुंबई
उम्र के उस पड़ाव पर आकर सीमा ने पहली बार ठहरकर सोचा-
पूरी ज़िंदगी उसने किया ही क्या?
बचपन में ही माँ चली गई। पिता ने दूसरी शादी कर ली और सीमा अपनी उम्र से पहले ही बड़ी हो गई। छोटे भाई-बहनों की देखभाल, घर की ज़िम्मेदारियाँ और पढ़ाई सब कुछ उसने बिना किसी शिकायत के निभाया। सपने थे, पर उन्हें देखने की फुर्सत कभी नहीं मिली।
समय बीतता गया। भाई-बहन अपने-अपने रास्तों पर निकल गए। फिर उसकी भी शादी हुई। पति, बच्चे, घर सीमा हर रिश्ते में खुद को ढालती रही। वह सबके लिए थी, पर अपने लिए कभी नहीं।
जब वह भीतर से पूरी तरह थक चुकी थी, तब उसे लगा अब बच्चे बड़े हो गए हैं, शायद आगे का जीवन कुछ आसान होगा। वह उसी दिन का इंतज़ार करती रही, जब बच्चे नौकरी करने लगेंगे और ज़िम्मेदारियाँ हल्की होंगी।
दिन आए भी, पर उनकी कमाई कभी माँ तक नहीं पहुँची। ज़रूरत पड़ने पर वही याद आई, बाकी समय सब अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त रहे। सीमा मुस्कुरा देती शायद यह मानकर कि उसकी नियति में देना ही लिखा है।
एक दिन उसने खुद को फिर से मज़बूत किया। उसने तय कर लिया कि अब वह किसी सहारे पर निर्भर नहीं रहेगी। उसने काम करना शुरू किया, धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गई।
अब बच्चे कहने लगे
“आप हमारे साथ रहो।”
अब उनके पास पैसा था।
सीमा ने मन ही मन एक सवाल किया
क्या यही जीवन का कड़वा सत्य है?
क्या आज की संतान रिश्तों को सुविधा की कसौटी पर परखने लगी है?
अगर ऐसा है, तो यह उन सभी माता-पिता के लिए दुखद है, जिन्होंने कर्ज़ लेकर, अपने सुख त्यागकर, सिर्फ़ इस उम्मीद में बच्चों को पढ़ाया कि बुढ़ापे में अपनापन मिलेगा।
सीमा अब समझ चुकी थी
माँ होना त्याग है,
पर आत्मसम्मान छोड़ देना
किसी रिश्ते की शर्त नहीं।
Awesome 👌
Keep it up👍
True depiction of our society and value system. Writer has very deep understanding of subject.