अस्थाई मजदूर

विनीता गोविंदन, लेखिका, यूएसए

शहरों में काम करने वाले हम, जिन्हें “अस्थाई मजदूर” कहा जाता है, उनके परिवारों की कहानी अक्सर अनसुनी रह जाती है। उनकी पत्नियां अपने गांव में खेतों में मेहनत करके सब्ज़ियां उगाती हैं और उन्हें बेचकर अपने परिवार का गुजारा करती हैं। उनकी सरलता, उनकी मेहनत, उनका प्राकृतिक सौंदर्य—यह सब कभी-कभी चर्चा का विषय बनता है। कोई चित्रकार उन्हें अपनी कला में कैद करता है, कोई शहरी उनके चित्रों से अपने घर की दीवारों को सजाता है। लेकिन इन महिलाओं के हिस्से केवल अपने पतियों के लौटने का बेसब्री से इंतजार ही आता है।
अस्थाई मजदूरों के परिवार कितनी कठिनाइयों से गुजरते हैं, इसका अहसास केवल हम ही कर सकते हैं। यही अहसास हमें उनके जीवन में सहारा बनने के रास्ते दिखाता है। यदि हमारे घर में कोई वस्तु बेकार पड़ी है, उसे अलमारी में बंद करके यादों के लिए रखने के बजाय, हम इसे इन परिवारों को दे सकते हैं। जरूरत से अधिक बर्तन, कपड़े या अन्य चीज़ें बाँटकर उनका उपयोग उनके जीवन को आसान बना सकता है।
छोटी-छोटी मददों से भी हम उनके जीवन में बड़ी राहत ला सकते हैं। यह न केवल दूसरों की सहायता करने का काम है, बल्कि पुण्य अर्जित करने का एक गहरा और अर्थपूर्ण तरीका भी है।

2 thoughts on “अस्थाई मजदूर

  1. विनीता जी ,आपने एकदम सही लिखा। आज ही ऐसा कुछ कार्य किया और उनके चेहरों पर जो खुशी देखी, वह त्यौहार की असली खुशी है । और जब आप आपको देखकर और लोग भी आपसे जुड़ते जाएं इस अच्छे काम में, तो सब कुछ सार्थक लगने लगता है।

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