अपुन की दादीगीरी

आकांक्षा सिंह, प्रसिद्ध लेखिका, जबलपुर

बात उन दिनों की है, जब हम कक्षा पाँच पास करके छठवीं कक्षा में दाख़िला लेकर अपने पिताजी उर्फ़ डैडी के विद्यालय पहुँचे। प्रथम दिन तो सोचने-समझने से परे था। थोड़े सहमे से भी थे हम, क्योंकि पिताजी उर्फ़ डैडी बहुत गुस्से वाले थे। उनका जलवा घर में ही नहीं, पूरी जवार मतलब आस-पास के इलाके में उसी हिसाब से फैला था, जैसा कि हम घर में कभी-कभार रूबरू हुआ करते थे। विद्यालय में भी उनका दबदबा ज़रा भी फीका नहीं पड़ा था, बल्कि उस तमगे में एक और तमगा लग गया था-“गुरुजी बड़े गुस्से वाले हैं।”

हर दूसरा व्यक्ति यही जानना चाहता था कि क्या वे इसी प्रकार घर में भी गुस्से में रहते हैं। उम्र में छोटे होने के नाते जवाब भी अक्सर “हाँ” में ही रहता था। पिताजी उर्फ़ डैडी बहुत अनुशासनप्रिय थे, तो इस कारण मुझे प्रथम दिवस से ही विद्यालय में हाज़िरी लगानी पड़ी।

प्रथम दिवस में विद्यालय में मेरे अतिरिक्त कुछ अन्य बालकगण आए थे.बता दूँ, केवल बालकगण ही थे या फिर अन्य कर्मचारीगण। किंतु मेरा जाना नियमित ही रहता था। हमारे पिताजी उर्फ़ डैडी सरकारी मास्टर थे, और सरकारी कामकाज कितनी तल्लीनता से चलता है, यह भी आपको बहुत अच्छे से पता ही होगा। तो विद्यालय में प्रथम दिवस का खुमार एक-दो दिन नहीं, बल्कि महीनों चलता था। जुलाई माह तो केवल दाख़िला करने-करवाने के उत्सव में बीत जाता था, और अगस्त माह में जब विद्यालय शुरू होता, तो वह गति पकड़ते-पकड़ते स्वतंत्रता दिवस तक पहुँच जाता था। स्वतंत्रता दिवस के बीतने के बाद शिक्षक व विद्यार्थीगण को लगता था कि अब कुछ अध्ययन व अध्यापन का कार्य होना चाहिए। किंतु मेरी कहानी थोड़ी उल्टी थी।

होता यह था कि मेरे पिताजी उर्फ़ डैडी अत्यधिक अनुशासनप्रिय होने के कारण हमें रोज़ समय से विद्यालय जाने की दीक्षा प्रथम दिवस ही दे चुके थे। उनकी बात की अवमानना कर हम स्वयं श्रीमान यमराज जी को नहीं बुलाना चाहते थे। किसी व्यक्ति का नाम नहीं है यमराज नारकाधिपति की बात कर रही हूँ। उनके कोप का भंजक कौन बन पाएगा? कम से कम मैं तो बिल्कुल ही नहीं।

तो हमने भी पिताजी उर्फ़ डैडी की बात को यथावत मानने का दृढ़ निश्चय कर लिया और प्रभातकालीन विद्यालय में पहुँचकर अपने पिताजी की आज्ञा की प्रतीक्षा करते कि कब हमारे पिताजी महाराज उर्फ़ डैडी हमें आज्ञा दें और हम घर को प्रस्थान करें।

विद्यालय में मेरा मन ही नहीं लगता था। वजह यह नहीं थी कि हमें पढ़ने में रुचि नहीं थी। वास्तविक वजह यह थी कि कक्षा के नाम पर हम और हम, और केवल हम होते थे। तो चाहे शिक्षक की भूमिका हो, तो भी हम थे; चाहे विद्यार्थियों की भूमिका, वहाँ भी हम ही थे। अकेले कक्षा में बैठे देख हमारे एक आदरणीय अंकल जी, जो अब मेरे ‘सर’ अर्थात गुरुदेव की भूमिका निभाने वाले थे, कभी-कभार आकर हमें अनुग्रहित कर देते थे। बाकी समय हम भी दादीगीरी के हुनर सीख-सीखकर पारंगत हो रहे थे।

नर्सरी से प्राइमरी पास थे हम, सो अंग्रेज़ी से पूर्ण दक्ष अर्थात अपनी कक्षा भर को तो दक्ष थे ही। उस समय सरकारी विद्यालयों में अंग्रेज़ी छठवीं कक्षा से पढ़ाई जाती थी। सो हम तो पूर्ण ज्ञान बटोरकर आए थे, क्योंकि A for Apple अब क्या पढ़ते। रहा अल्फ़ाबेट, तो उसमें भी हम पूर्ण दक्ष थे।

कुछ इन्हीं कारणों से अपनी दादीगीरी पूरे ज़ोरों पर थी। फीके तो हम तब होते थे, जब पिताजी महाराज उर्फ़ डैडी समक्ष प्रकट हो जाते थे। फिर तो सारी दादीगीरी एक जगह रह जाती थी और मेरी हालत देखने लायक हो जाती थी। कोई मज़ाक बना नहीं सकता था इस कारण से, क्योंकि पिताजी उर्फ़ डैडी के समक्ष तो किसी की भी नहीं चल पाती थी।

एक गुरुदेव, जो मेरे पिताजी उर्फ़ डैडी के शिष्य भी थे और हमारे अंग्रेज़ी विषय के शिक्षक भी, गुरुदक्षिणा स्वरूप हमें कर्सिव राइटिंग व कैलिग्राफ़ी में दीक्षा दिया करते थे। बाकी सब में तो हम पूर्णरूपेण पहले ही पारंगत थे (अपनी स्तर-भर को)। सीखने के लिए मेरे पास मूल रूप से केवल दो ही चीज़ें थीं पहली कैलिग्राफ़ी, दूसरी दादीगीरी।

तो आगे की व्यवस्था कुछ ऐसी थी कि विद्यालय में उच्च कक्षा के छात्र-छात्रा, जिन्हें हम दीदी व भइया से संबोधित करते थे, उनका भी एक प्रभाव था। हम गुरुजी की बिटिया थे, इसलिए अधिक प्रेम व सहानुभूति के साथ हमें अपनाया जाता था।

कक्षा के छात्रों को तो हम अपने पाल्य ही समझते थे। विद्यार्थियों को भी कुछ ऐसा ही भ्रम था। आर्थिक रूप से अभाव वाले विद्यार्थी ही हमारी कक्षा में अधिक थे। शायद इस कारण से भी सब हमें उच्च पद पर आसीन कर बैठे थे। परंतु इन सब परिस्थितियों के चलते हम कभी भी अपनी साम्यता सबसे नहीं बैठा पाए।

आख़िर दीदीगिरी का मुद्दा भी तो था। अपना वर्चस्व हर परिस्थिति में बनाए रखना था। बस यही कारण था और अपुन की दादीगीरी पूरी तरह से चमकती रहती थी।

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