कितनी अनोखी है यह दुनिया जिसमें एक छोटी सी मुलाक़ात एक इंसान को दूसरे इंसान से जोड़ देती है!
जुड़ना बहुआयामी होता है। बच्चे के जन्म देते ही माँ उससे जुड़ जाती है। कुछ देर बाद शिशु भी अपनी माँ से जुड़ जाता है क्योंकि उसकी पहली खुशनुमा मुलाक़ात माँ से होती है, उसके सामीप्य और उष्ण दुग्ध-धार से होती है। धीरे-धीरे अन्य मुलाकातें बढ़ती जाती हैं और नए रिश्ते पनपते जाते हैं। शुरुआती संबंध मानवीय आधार पर बनते और बढ़ते हैं लेकिन बचपन बीत जाने के बाद ये संबंध आपसी रुचियों और व्यवहार की जमीन पर विकसित होते हैं।
किशोरावस्था में सम्बन्ध की नई इबारतें संवेदनाओं की कलम से लिखी जाती है, उन दिनों हमउम्र दोस्त बनते हैं, समलिंगी और विपरीतलिंगी धागे बुने जाते हैं। कमजोर धागे रास्ते में टूटते जाते है, वहीं पर कुछ अपनी मजबूती बनाए रखते हैं और इस तरह धागे-धागे एक दूसरे से गुंथकर मजबूत किसी रिश्ते का नाम दे देते हैं।
सबसे अधिक मिठास वाला रिश्ता होता है, किसी वयस्क स्त्री और पुरुष का मानसिक और शारीरिक रूप से जुड़ना। शारीरिक जुड़ाव भले ही टिकाऊ न हो लेकिन सम्बन्धों को बनाए रखने में मददगार साबित हुआ है, वहीं पर मानसिक जुड़ाव ताउम्र बना रहता है। मानसिक जुड़ाव एक-दूसरे की समान रुचियों, संतुलित वार्तालाप और दुख-सुख में साथ देने के ज़रिए धीरे-धीरे बढ़ता है, रिश्ते का नाम चाहे जो हो। इन रिश्तों में सबसे शीर्ष पर है पति-पत्नी का रिश्ता जो खटमिट्ठा तो होता है लेकिन बिना ‘प्रिजर्वेटिव’ के सालों-साल चलता है।
नेपोलियन हिल लिखते हैं -‘लंबे समय तक साथ रहने के बाद पति और पत्नी के चेहरे एक जैसे हो जाते हैं। कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति भीड़ में अलग-अलग खड़े होने पर भी उन्हें उनके चेहरे की साम्यता के आधार पर खोज सकता है।’
चेहरे की यह साम्यता दोनों के शारीरिक संपर्क से नहीं, उनकी मानसिक अंतःक्रिया से बनती है।

द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
वरिष्ठ साहित्यकार, मोटिवेशनल स्पीकर
बिलासपुर