हरी दूब

रीता मिश्रा तिवारी, प्रसिद्ध लेखिका, भागलपुर (बिहार)

आराम करना आलस नहीं सुकून भरे चंद लम्हे हैं
गहराते बादल में आकाश नीला नहीं स्याह होता है..।

आकाश गहराता है पल पल हर पल रात के गहरे रंग में
और गहरा रंगता गया नीले से स्याह तो कभी काला
आकाश थोड़ा रंगीला है..।

खुला आसमान और व्यस्त सड़क किनारे
कचरा विनता दुर्बल कमजोर इंसान
अजीबोगरीब आवाज सुनकर दुआ करता है
एक खुशहाल संसार की..!

ज़रा बैठो पेड़ की ठंडी छांव में कभी
गर्मी के दिनों में रुई सी मुलायम हरी दूब पर
रख्खो देह कभी आराम नहीं सुकून मिलता है..!

यह बात अलग है कि शरद की रात
झरती है गगन से ओस की बूंदें
पत्तों की फ़ुनगी पर ठहरता है सूरज के आने तक
धूप की किरणों में बिखर कर रह जाता है
मेरे बगीचे की हरी दूब पर..!

तेरे एहसासों के लिहाफ में लिपट कर
सुकून मिलता है मुझे हरी दूब पर..!

2 thoughts on “हरी दूब

  1. रंगीला आकाश और हरी दूब का एहसास बहुत खूबसूरत

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