पिताजी,
आपका व्यक्तित्व मेरे लिए सदा एक विद्यालय रहा।
घर की चौखट से लेकर जीवन की पाठशाला तक,
आपने हर कदम पर
अनुशासन और मर्यादा का पाठ पढ़ाया।
आपकी डाँट में भी करुणा थी,
आपकी कठोरता में भी प्रेम छिपा था।
आपने हमें केवल पढ़ाया नहीं,
बल्कि जीना सिखाया—
सच्चाई से, ईमानदारी से,
कर्तव्य और उत्तरदायित्व के साथ।

आज जब पूरा देश शिक्षक दिवस मना रहा है,
मैं सोचती हूँ—
मेरे जीवन का पहला शिक्षक कौन था?
उत्तर सहज है—
वह आप ही थे, पिताजी।
अद्भुत संयोग है,
आप शिक्षक होकर
इसी शिक्षक दिवस के दिन
सदा के लिए इस भौतिक जगत को छोड़ गए।
शायद यही आपकी अंतिम सीख थी,
कि सच्चा शिक्षक वह है
जो अपने जीवन से भी
संदेश छोड़ जाता है।
आज भी जब अनुशासन टूटने लगता है,
आपकी स्मृति मुझे सँभालती है।
जब थकान या निराशा घेरती है,
आपकी दी हुई सीख ऊर्जा बनकर
मार्ग दिखा जाती है।
पिताजी,
आपका जीवन ही मेरा आदर्श अध्याय है,
आपकी स्मृतियाँ मेरा अनंत पाठ्यक्रम हैं।
आपको शिक्षक दिवस पर
सादर नमन।

सुप्रसन्ना झा, प्रसिद्ध लेखिका, जोधपुर (राजस्थान)