धूप आती है….

धुंधलका छाते ही
मन धीरे-धीरे बोझिल
हुआ करता है –
घर लौटते परिंदों की क़तारों में
दिखती है फुर्ती, सुकून और चाह घोंसलों तक
पहुंचने की,
ताकि अपनी चोंच में दबा बीज खिला सके नन्हें शिशुओं को –
इसीलिए मीलों उड़कर भी वो थके नहीं हैं
हौसला देते हैं ये लौटने का
अपने ठिकाने पर
जहाँ सांझ से रात तक बसर हो सके।
सांझ जो तुम्हें देखते दौड़ती नहीं बांहों में भर पुचकारने,
घर के बरामदे में बहती हवा सहलाकर तुम्हारा माथा नहीं चूमती,
बारिश की सोंधी माटी निहारते हुए अठखेलियाँ नहीं भरती तुम्हारे होंठों पर,
बस यंत्रवत चलता रहता है तन-
सांझ को रात के आगोश में पनाह लेते देखता मन
झर-सा जाता है, सूखे पत्तों की तरह।

पत्तों का शोर सुन कराह उठता है पहाड़ हुआ मन,
उदास आस और टूट चुका स्वप्न
खाने की टेबल पर बर्तनों का कोई राग नहीं
चिरौरी कर कुछ निवाले और परोसने का जतन नहीं
मनभर खाने का अब मन नहीं
बस बची है कवायद जिंदा बचे रहें थोड़ा,
शायद अभी भी धूप आती है गलियारों से
और पतझड़-सा मन
ताकता है बसंत को-
और ताकते-ताकते
आँखों से निकल पड़ता है
नमकीन पानी,
पानी जिसे पोंछने को कोई हाथ आगे नहीं आता
तकिये के भीगने का उपक्रम भी लगातार बना रहता है
बादलों से ठिठोली करता चाँद खिड़की की सरहदों से आगे निकल चुका है
गली से आती कुत्तों की आवाजें भी अब मद्धिम हो चली हैं
पर रात है कि उतरती नहीं
न ही उतरता है ये ख़ामोश सफ़र,
सफ़र जहाँ करवट बदलने पर कोई सहयात्री नहीं
दिन भर के बोझ को उतार फेंकने को कोई अलगनी नहीं
अंतर्द्वंदों को पाटने इस पार से उस पार तक कोई पुल नहीं
अलसाई-सी सुबह में कोई गर्मजोशी का घूंट नहीं
आँखों ही आँखों में थकन का बहाना भी ख़त्म हुआ
बस गर्म हवा और बारिश के थपेड़ों से जूझते
उसी आठ बीस की बस को पकड़ने में तेज़ हो चलें हैं
हाथ और सुस्त क़दम –
कदम उठे तो मन भी पुरसुकून हो चला चार पहर तक
अब कोई अनाधिकृत दस्तक नहीं आएगी अंतस में
खिले-खिले चेहरों की आमद
छेड़ेगी नई कहानियाँ और खिल उठेगी प्रकाशिनी
और इन्हीं में डूबते-उतराते धीरे-धीरे
उतर जाएगा-
सांझ से रात तक का मलाल।

अंजू ‘सुंदर’, असिस्टेंट प्रोफेसर लखनऊ

8 thoughts on “धूप आती है….

  1. धन्यवाद संपादक जी
    हमारी पंक्तियों को इतने सुंदर चित्र के साथ आपने वेबसाइट पर साझा किया 💐🎉

  2. बहुत सुंदर वर्णन है बहुत लोग इस दौर से गुजरते है जहां न कुछ पाने की चाह न कुछ खोने का डर ,बस पुरानी यादें और अकेलापन।

  3. बेहद उम्दा सृजन 👏👏 सभी का जीवन कभी कभी न इस दौर से जरुर रुबरु होता ☺️☺️

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