
डॉ. रत्ना मानिक, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर
सर्द हवा के थपेड़े उसके पतले, घिस चुके स्वेटर का भेदन करते हुए उसकी हड्डियों का कचूमर निकाल देने पर उतारू थे। बाइक के हैंडल पर जकड़ी उसकी अंगुलियों जम कर सुन्न पड़ती जा रही थीं । एक उचटती नज़र उसने गाड़ी के किलो मीटर के कांटे पर डाली और रफ़्तार थोड़ी और बड़ा दी।
“सुन रहे हो!,मीतू का एक नया स्वेटर लेना होगा, पुराना स्वेटर कोहनी से फट गया है और उसकी टीचर ने भी नया स्वेटर बनवाने के लिए कहा है। और हां! इस बार बड़ी मिन्नत करके मैंने उसकी मैम से थोड़ी मोहलत मांगी है कि अगले महीने हम तीन महीने की फीस एक साथ दे देंगे वरना वे तो स्कूल से उसका नाम काट देने की ज़िद पर अड़ी थीं।”पत्नी की बातें उसके कानों में गूंज रही थीं।
उसका दिमाग फिर हिसाब-किताब में जुट गया…मकान का किराया,मीतू के स्कूल की तीन महीने की फीस, इस महीने का राशन और पिछले महीने के राशन का सात सौ रुपया बकाया… फिर उसे मां की गठिया के दर्द से सूजी हुई अंगुलियां और घुटनों का दर्द याद हो आया…वो तो भूल ही गया था कि उनकी होम्योपैथिक दवाइयां भी तो इस बार लेनी हैं। सात सौ, आठ सौ की दवाइयां न लेनी पड़े ऐसा सोचकर पिछली बार मां ने झूठ ही कह दिया था- “क्या फायदा इत्ती महंगी दवाइयां खाकर,जरा भी आराम नहीं मिलता है, मत लाया कर बेकार में इत्ती महंगी दवाइयां।”
दिमाग कुछ और जोड़-तोड़ करता कि तभी एक चमचमाती मोटर गाड़ी से उसकी जर्जर,मरियल,अधमरी सी गाड़ी जा भिड़ी ।सड़क पर चलती भीड़ को अपनी दरियादिली और न्यायप्रियता दिखलाने का एक सुनहरा अवसर मिला। लोगों ने कार और उसके मालिक को अपने घेरे में ले लिया लेकिन वो अपने लहूलुहान घुटने और हथेलियों से बहते खून से बेपरवाह छिटक कर दूर गिरे हेलमेट को पहनता हुआ,हाथों को झाड़ कर अपनी कलाई घड़ी की ओर देखा। घड़ी की कांच तो टूट गई थी लेकिन घड़ी की सांसें उसकी सांसों के जैसी ही टिक..टिक..करके अब भी जिंदगी से संघर्ष कर रही थीं ।अब भी सामान की डिलेवरी में पांच मिनट शेष थे। समय से पहुंच गया तो कस्टमर से अच्छी रेटिंग और कई नए आर्डर भी मिल जाएंगे।
उसने बाइक स्टार्ट कर दी…ऊपर वाले की ओर देखते हुए हवा में लहराता हुआ एक सलाम ईश्वर की ओर ठोका…एक हंसी उसके होठों पर तैर गई…बिल्कुल विद्रूप सी हंसी।
हृदयस्पर्शी