
विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद
आज मैं शॉपिंग करने जा रही थी।
हमेशा की तरह मैंने अपने पति से कहा,“मैं शॉपिंग करने जा रही हूँ।”इन्होंने मुझे देखकर पूछा-“तो…?”
“तो क्या… कैश…?” मैंने जैसे ही उनकी तरफ देखा, वे मुस्कुराकर बोले,-“आजकल तो सारे ट्रांजैक्शन पेटीएम, फोनपे से होते हैं। ”यह सुनते ही मैं थोड़ी उदास भी हुई और थोड़ी झुंझलाई भी।इस ऑनलाइन ट्रांजैक्शन ने हम घरेलू महिलाओं की
छोटी-छोटी खुशियाँ हमसे छीन ली हैं। कुछ अधिकार, जो हमारे जन्मसिद्ध थे,वो भी जैसे भ्रम बनकर टूट गए हैं।
कैशलेस ज़माने में हम पतियों की जेब से पैसे उड़ाने के मज़े ना ले पाती हैं, ना ही कपड़े धोते वक्त जेब से निकले पैसों की
वो खुशी अब मिलती है। वो भी क्या दिन थे.कपड़े धोते वक्त जेब से पैसे निकल आते थे। उस वक्त अहमियत पैसों की नहीं,
उस अनायास मिली खुशी की होती थी। उसी तरह शॉपिंग पर जाना .खरीदारी से ज़्यादा बचत का हुनर आज़माना होता था। कभी किसी को ज़रूरत पड़ गई तो झट से पैसे निकालकर बड़े गर्व से दे दिया करते थे। तब हम खुद को किसी एटीएम से कम नहीं समझते थे।
लेकिन वह गर्व, वह खुशी सब इस कैशलेस ज़माने ने हम घरेलू महिलाओं से छीन लिया है। मैं बिज़नेस क्लास महिलाओं की बात नहीं कर रही हूँ. कोई इसे दिल पर न ले। मैं जानती हूँ कि नए ज़माने के साथ कदम मिलाकर चलना ही समझदारी है,
पर आज भी हम उस दौर को याद करते हैं .जहाँ लेने-देने की चमक हमारी आँखों में जीत बनकर लहराती थी। आज चाहे कितने भी एटीएम खुल जाएँ, हमारे लिए तो हमारे पति ही एटीएम थे हैं और रहेंगे।
इसीलिए
मुझे इस कैशलेस ज़माने से ऐतराज़ है…
Very nice
💐👌
Well said sister
सच में ऐसी बहुत सी परिस्थितियां आती है, जब कहना ही पड़ता है… कैश की बात ही कुछ और है 👌👌
Bahut hi sacchi baat wahi samajh payenge jinhone us daur ko jeeya hai