मोना ठाकुर, लेखिका, मुंबई
भागती-दौड़ती मुंबई… और उस रात मैं एक ऐसे साहसिक मिशन पर थी, जहाँ मेरी मंज़िल तक पहुँचने के लिए दो कनेक्टिंग मेट्रो लाइन की पहेली सुलझानी थी। पहुँचना तो ठीक था, पर वापसी के समय लेट होने के कारण मन में एक ही चिंता का अलार्म बज रहा था—कहीं मेरी आखिरी मेट्रो छूट न जाए!
इस चिंता ने जैसे मेरे पैरों में पहिए लगा दिए थे। एक हाथ में भारी-भरकम बैग, दूसरे में जहाँ से लौट रही थी वहाँ का शानदार गिफ्ट बॉक्स, और इन सबके बीच मेरा पर्स… और हाँ, मैं थी अपनी साड़ी के शाही अंदाज़ में!
“और फिर क्या था!” मैं अपनी साड़ी संभालती, दोनों हाथों में सामान बैलेंस करती हुई चेकिंग मशीन के सामने खड़ी थी। हड़बड़ी में दिमाग शून्य! समझ ही नहीं आ रहा था कि इस पहाड़ जैसे सामान को मशीन पर कैसे रखूँ। तभी बगल वाली लाइन में से एक अजनबी ने हाथ से इशारा किया-“पहले आप अपना सामान रख दीजिए।” मैंने बिना उनकी तरफ देखे, सामान मशीन पर धकेला और महिला चेकिंग के लिए आगे बढ़ गई।
जब मैं मशीन से निकले अपने सामान के पास पहुँची, तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं! वही अजनबी मेरा इंतज़ार कर रहा था, मेरा सामान मुझे सौंपने के लिए! यह सब कुछ खामोश इशारों में चल रहा था। उसने इशारों में कहा: “मैडम, आपका सामान…” एक पल को मैं थमी, एक मीठी मुस्कान के साथ धन्यवाद दिया और बिजली की तेज़ी से मेट्रो की तरफ भागी।
किस्मत ने साथ दिया! मैं आखिरी पल में, आखिरी डिब्बे में, जैसे-तैसे चढ़ने में सफल हो गई! सामान से लदी-फदी मेरी हालत देख वहाँ भी एक भलेमानस को मुझ पर “दया” आ गई और उन्होंने अपनी सीट ऑफ़र कर दी। मुझे ‘दया का पात्र’ बनना कतई पसंद नहीं, मैंने तुरंत ‘ना’ कर दिया! पर वो सज्जन अपनी सीट से खड़े हो चुके थे। अब कोई और बैठे, इससे पहले मैंने सोचा-ठीक है, मैं ही बैठ जाती हूँ! अनायास मिली हुई सीट का आनंद लेते हुए।
चार-पाँच स्टेशन बाद मैं उतरी और सबसे पहले अपने मिशन में जुटी: सामान कम करो! मैंने बड़े बॉक्स से सामान निकालकर एक ही बैग में एडजस्ट किया। अब मैं थोड़ी फ्री-बर्ड महसूस कर रही थी, और तैयार थी अपनी अगली ट्रेन के लिए!
मुझे रेड लाइन से ब्लू लाइन की तरफ जाना था, और उससे पहले सबसे ज़रूरी काम टिकट लेना! जैसे ही मैं टिकट विंडो के पास पहुँची, मैंने फिर से उसे देखा! वही अजनबी सज्जन! वो लाइन में दूसरे-तीसरे नंबर पर थे और मेरा नंबर शायद दसवाँ!
तभी उसने मेरी तरफ देखा। एक और मुस्कुराहट का आदान-प्रदान हुआ इस बार थोड़ी लंबी! और फिर वो मेरी तरफ बढ़ आए।
“क्या मैं आपका टिकट लूँ?”
भला “नेकी और पूछ-पूछ” पर मैं ‘ना’ क्यों कहती!
मैंने पर्स से पैसे निकालकर उनके हाथ में थमा दिए, और पीछे इंतज़ार करने लगी। चमत्कारिक गति से वह टिकट लेकर वापस आए, मुझे टिकट दी और बोले: “हम दोनों का स्टेशन एक ही है!”
मैंने भी तुरंत कहा: “चलिए फिर, साथ ही चलते हैं!” और हम दोनों सीढ़ियों की तरफ बढ़ गए।
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए, उसने बातों का सिलसिला शुरू किया:
“इट्स योर बर्थडे टुडे?”
मैंने हँसकर कहा: “आपको ऐसा क्यों लगा?”
“आपके हाथ में केक का बॉक्स देखकर!”
मैंने खिलखिलाकर कहा: “अरे, वो केक नहीं, जहाँ गई थी, वहाँ वालों ने फूड बॉक्स दिया था।”
जैसे ही उसने पूछा कि मैं कहाँ गई थी, और जब मैंने बताया कि मैं कहां और क्यों गई थी, तब उसकी उत्सुकता शांत होने के बजाय और बढ़ती गई! उसने कहा- पहली नजर में देखकर मुझे ऐसे लगा जैसे आप किसी स्कूल या कॉलेज की प्रिंसिपल हैं। मुझे भी अपनी तारीफ सुनना अच्छा लग रहा था-“यू आर वेरी वेल मेंटेंड”, “यू आर लुकिंग सो ग्रेसफुल इन साड़ी!”, “योर पर्सनैलिटी इज सो इंप्रेसिव!”
आप इतने साल “हाउसवाइफ” रही और उम्र के इस मोड़ पर इतना बड़ा बदलाव… काबिले तारीफ है। “यू डोंट लुक लाइक योर एज। यू लुक मच यंगर!”
बातचीत का सिलसिला कुछ यूँ चला कि लगा ही नहीं कि हम सिर्फ पाँच मिनट पहले मिले थे! वह बोला-“मुझे लगा था कि आपकी फर्स्ट ट्रेन मिस हो गई है।”मैं भी हंसते हुए बोली-“नहीं, मैं पी.टी. उषा बनकर ट्रेन में चढ़ने में सफल हो गई थी।” तब वह जोर से हँस पड़ा।
आगे पता चला कि हमारे बच्चों का स्कूल भी एक ही था! सफर के दौरान मैंने महसूस किया कि जाने-अनजाने में उसका हाथ कई बार मुझे छू गया। मैं ‘अति-सावधानी’ बरतते हुए किनारे की तरफ खिसकती रही। और फिर बहुत जल्दी ही वह ‘आप’ से ‘तुम’ पर आ गया! मुझे भी कोई एतराज नहीं था। मैं दरअसल बहुत उत्साहित और खुश थी अपने अगले दिन के कार्यक्रम को लेकर। खुशी के उन भावों में बहते हुए मैं उसके चेहरे के भाव देख ही नहीं पाई। बातों ही बातों में उसने बताया-अपने घर, अपने परिवार, अपनी वाइफ के बारे में। उसकी बातें सुनकर लग रहा था कि वह एक हैपिली मैरिड मैन है। मैंने भी उसे बताया कि मेरे पति मुझे लेने मेट्रो स्टेशन आने वाले हैं।
बातें करते-करते सफ़र कब कट गया, पता ही नहीं चला! स्टेशन आ गया। हम दोनों साथ-साथ ही सीढ़ियाँ उतरे। अब हमारे रास्ते दो अलग दिशाओं में मुड़ने वाले थे। सीढ़ियाँ उतरते हुए उसने एक बम फोड़ा!
“पहले मैं अपनी कार से ही जाने वाला था, लेकिन फिर लगा कि नहीं, कार पार्क करके मेट्रो से चलता हूँ… अगर आज मैं मेट्रो से नहीं आता, तो आप जैसी खूबसूरत और अट्रैक्टिव महिला से मिलने का मौका गंवा देता!”
मैं खिलखिला कर हँस पड़ी और बोली: “बस भी करो! I am also glad to meet a handsome man…”
तभी अचानक उसके चेहरे के हाव-भाव कुछ बदले। हम अब आमने-सामने थे। तभी उसने कुछ कहा जिसे सुनकर मैं बुत बन गई…उसने कहा—”कैन वी हग?”
इतना अप्रत्याशित! मैं स्तब्ध थी। मैंने इशारे से असहमति जताई।
वह एक बार फिर बोला—”जस्ट ए कैजुअल हग, लाइक फ्रेंड्स!”
इस बार मैंने थोड़ी हिम्मत जुटाकर हँसकर कहा: “यह संभव नहीं…”
तब उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया हैंडशेक के लिए। हाथ मिलाकर मैं मुड़ने लगी।
उसने कहा: “मैं समझता हूँ, इसलिए मैंने तुम्हारा नंबर भी नहीं माँगा।”
मैंने पलटकर कहा: “डोंट वरी, हम एक ही एरिया में रहते हैं, फिर मिलेंगे!”
उसके कुछ अटके हुए से शब्द निकले: “कब?”
लेकिन मैं अनसुना करके अपने घर की दिशा में मुड़ गई।
और अब… यह कशमकश!
पर जब से लौटी हूँ, यही सोच रही हूँ कि वह आग्रह-वह धृष्टता थी? या एक क्षणिक, बलवती चाह? अगर किसी भी तरह का संबंध आगे बढ़ना चाहता तो नंबर मांग सकता था। शायद मैं दे भी देती। वैसे देखा जाए तो आज की पीढ़ी तो मिलते समय, जुदा होते समय हर बात पर हग करके ही अपनी भावनाओं को जताती है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है, मेरा ऐसा मानना है।
लेकिन हमारी पीढ़ी में यह इतना आम नहीं है। वह चाहता तो बदतमीज़ी भी कर सकता था, आसपास कोई नहीं था। जब मेरा हाथ उसके हाथ में था तो वह मुझे अपनी तरफ खींच सकता था। लेकिन उसने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया। ना ही ऐसी कोई मंशा नजर आई। हाथ के स्पर्श में भी अश्लीलता का पुट नहीं था। हम औरतों को भगवान ने एक विशेष दृष्टि दी है एहसास को पहचानने की। हमें पता होता है कि किस भाव से स्पर्श किया जा रहा है वासना का, प्यार का, इज़्ज़त का। उसने तो मेरा नंबर भी नहीं माँगा था।
और मैं… मैं अपनी ही छोटी-छोटी खुशियों में इतनी खुश थी कि मुझे एहसास ही नहीं हुआ कि सामने वाले के मन में मेरे लिए कुछ ऐसे भाव जागृत हो रहे हैं।
अब उसका तो पता नहीं… लेकिन मेरी नज़रें उसे हर तरफ ढूँढ रही हैं… यह जानने के लिए कि ऐसा क्या था, कि उसने मुझे यह सवाल पूछने की हिम्मत क्यों की कैन वी हग?”
बहुत ही रोमांचक किस्सा…. कितना मुश्किल है…. महिला का सहज होना….
हर वक्त सावधान! होशियार! रहना चाहिए।
प्यारी सी कहानी 👌👌😊
खूबसूरत कहानी..
मासूम भावनाओं से भरी कहानी दिल को छू गई
जय हो
बहुत बहुत धन्यवाद