
पूनम सिंह, प्रसिद्ध लेखिका, मेरठ
हर इंसान अपनी एक अलग जीवन-शैली लेकर आता है. अलग सोच, अलग व्यवहार, अलग नज़रिया और अलग हुनर। दुनिया में कोई भी दो व्यक्ति एक जैसे नहीं होते। कोई बहुत कुछ सह लेता है पर कह नहीं पाता, तो कोई खुलकर कह देता है पर सह नहीं पाता। कोई मौन की भाषा भी पढ़ लेता है, और कोई साफ़-साफ़ कह दी गई बातों को भी नहीं समझ पाता। यही तो इंसानी विविधता है, यही जीवन का सत्य।
फिर भी विडंबना यह है कि हम अक्सर दूसरे इंसान में अच्छाइयों को देखने के बजाय उसकी कमियाँ खोजने लगते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि खामियाँ हर किसी में होती हैं। कोई भी व्यक्ति पूरी तरह परफेक्ट नहीं होता। परफेक्शन की उम्मीद जब रिश्तों में प्रवेश करती है, तभी टकराव की शुरुआत हो जाती है।
आज का समय और भी विचलित करने वाला है। परिवार के नाम पर अब अक्सर सिर्फ चार लोग ही साथ रहते हैं, फिर भी उन चार लोगों के बीच चार सौ मीटर की दूरी और गहरा मनमुटाव दिखाई देता है। सवाल यह है कि जब संख्या कम हुई है, तो दूरी क्यों बढ़ गई?
अगर हम थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो पाएँगे कि पहले एक ही छत के नीचे तीन-चार पीढ़ियाँ साथ रहती थीं। दादा-दादी, माता-पिता, बच्चे सब एक-दूसरे के सुख-दुख के साझेदार होते थे। यह मान लेना गलत होगा कि उस समय झगड़े या मतभेद नहीं होते थे। होते थे, जरूर होते थे। लेकिन तब प्रेम, सम्मान और सहनशीलता इतनी प्रबल थी कि वे झगड़े ज्यादा समय तक टिक नहीं पाते थे। रिश्तों की जड़ें गहरी थीं, इसलिए तूफान उन्हें उखाड़ नहीं पाता था।
आज स्थिति उलट है। लोग एक-दूसरे की बात सहने का धैर्य खोते जा रहे हैं। न केवल सहन नहीं कर पा रहे, बल्कि सहने की कोशिश भी नहीं करना चाहते। संवाद की जगह तर्क-वितर्क ने ले ली है, समझ की जगह अहंकार ने और समायोजन की जगह “मैं सही हूँ” की ज़िद ने।
इसी सहनशीलता के अभाव का परिणाम है कि घर टूट रहे हैं, बच्चे दिशाहीन हो रहे हैं और लोग साथ रहते हुए भी भीतर से अकेले होते जा रहे हैं। रिश्ते निभाने का अर्थ केवल साथ रहना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की कमजोरियों को स्वीकार करना, मौन को समझना और मतभेदों के बावजूद संबंधों को प्राथमिकता देना है।
शायद अब समय आ गया है कि हम फिर से सहन करना सीखें सिर्फ दूसरों को नहीं, बल्कि उनकी भिन्नताओं को भी। क्योंकि जब हम इंसान को उसके पूरेपन के साथ स्वीकार करते हैं, तभी रिश्ते बचते हैं, परिवार जुड़ते हैं और समाज में फिर से अपनापन लौटता है।
बिल्कुल यथार्थ व सटीक लिखा है आपने 👌👌