तुम और तुम्हारी यादें…

मीनू राजेश शर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, रायपुर (छत्तीसगढ़)

रोज़ भूलने की करूँ कोशिश, दिन-रात,
पर तुम और तुम्हारी यादें नहीं भूलतीं बात।
प्रेम याद आते, कभी आते वादे याद,
हर पल देखूँ राह मैं, अब भी बरसों बाद।

चाहा मुझको खूब था, किए वादे हज़ार,
पल में सब कुछ तोड़कर, गए चाँद के पार।
देख रही चुपचाप मैं तेरा अत्याचार,
कैसे निर्मोही बन गया, साजन मेरा प्यार।

मेरा क्या होगा, नहीं सोचा तुमने एक बार,
चले गए तुम छोड़कर, दिया मुझको बिसार।
नीर बहाते नैन हैं, दर्द समेटे आह,
तड़प रही दिन-रात मैं, मुझको तेरी चाह।

बिन पहिए गाड़ी चले, ऐसे चलती जान,
सब कुछ मेरा खो गया, लुट गया सम्मान।
मेरे सपने टूटकर बिखरे जैसे काँच,
याद रखूँ सँभालकर, जैसे कोई साँच।

बैठ अकेले सोचती, साजन, तेरी बात,
एक जनम को क्या कहूँ, जन्में पाऊँ सात।
मुझमें ज़िंदा तुम और तुम्हारी यादें,
तेरी यादों में ज़िंदा हूँ मैं।

दूर हैं तो क्या हुआ, एक-दूजे के पूरक हैं हम,
इंतज़ार मेरा तू करे, इंतज़ार तेरा मैं करूँ।
तुझमें ज़िंदा हूँ मैं, मुझमें तू ज़िंदा है,
दूर रहें या पास हम दोनों एक परिंदा हैं।

One thought on “तुम और तुम्हारी यादें…

  1. यादें तो यादें ही हैं
    प्यार को हम भूल नहीं सकते
    सुंदर रचना दिल से दिल तक

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