स्वार्थ…

डॉ. रश्मि, प्रसिद्ध लेखिका

कई बार अंधेरों ने छला है,
कई बार गिर के उठा है
दिल को तो आदत हो गई टूटने की,
जुड़ने की भी इसकी अदा है।
बार-बार कहता है दुनिया में प्यार है, वफ़ा है,
फिर क्यों ज़ार-ज़ार यह रोता है?
कहते हैं प्यार देने की वजह है,
फिर क्यों कहता है कि प्यार में मेरा सब कुछ लुटा है?
न जाने यह दुनिया कैसी सच्चाई है,
जिसमें हर कोई कहता है कि सबने हमें ठगा है।
काश कि हर किसी को यह समझ आता कि
ना प्यार है, ना वफ़ा
यह तो मामला सिर्फ “स्वार्थ” पर टिका है!

2 thoughts on “स्वार्थ…

  1. सच कहा आज के जमाने में सब कुछ स्वार्थ पर ही टिका है

  2. सुर,नर, मुनि सबहिं की रीति
    स्वारथ लागी करिहिं सब प्रीती

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