रामलीला से अलग, टंकी चौराहा की नाटक कंपनी का मनोरंजन

सुरेश परिहार, पुणे
महिदपुर रोड की रामलीला भक्ति, आस्था और परंपराओं में डूबी रहती थी. जिसमें पूरा शहर नवरात्रि और दशहरे के भक्ति-रंग में रंग जाता था. लेकिन उसके बाद, उसी कस्बे में एक और दुनिया जीवंत होती थी. नाटक कंपनी की जगमग रोशनी वाली दुनिया, जो टंकी चौराहे के पास लगी रहती थी, जहाँ आज ग्राम पंचायत ने कॉम्प्लेक्स बना दिया है. यहां पहले एक पानी की टंकी हुआ करती थी. इसलिए इसे टंकी चौराहा कहते थे. रामलीला धार्मिक और शुद्ध भक्ति से भरी होती थी, सभी कलाकार पुरुष शिव, राम, हनुमान, राधा, सब रूप बदलकर निभाए जाते. वहीं नाटक कंपनी अलग स्वाद लिए आती थ़ी. जरा शोख, ज़रा रंगीन, ज़रा फिल्मी. यही फर्क उसे अलग पहचान देता था. नाटक कंपनी जहां तालियों से ज़्यादा सीटी बजती थी. उस ज़माने में टिकट की कीमत थी. सिर्फ 1 रुपया.
एक शो, रात का समय, और मेला-सा माहौल. सिनेमा तब आसानी से हर जगह नहीं मिलता था, इंटरनेट तो कल्पना भी नहीं. कला देखने का सबसे बड़ा ठिकाना यही था. “आशारानी बॉम्बे” और “बेबी रानी” जैसे नाम मंच पर आते ही पंडाल में हलचल मचा देते. शायद नाम असली न हों, पर लोगों की यादों में आज भी चमकते हैं.
“हरिश्चंद्र-तारामती” की करुण कथा हो या “लैला-मजनूं” का इश्क, “सुल्ताना डाकू” की वीरता हो या “रुप-बसंत” नाटक चलता रहता, पर असली इंतज़ार होता डांस के लिए.
इशारों में नोट, तालियों में इनाम
दर्शकों का उत्साह देखने लायक होता. किसी गाने पर मन लहलहा उठा तो दर्शक अपनी सीट पर बैठा-बैठा ही नोट दो उंगलियों के बीच दबाकर ऊपर कर देता. डांसर की नजरें भी बाज जैसी होती थी.
संगीत की धुन पर थिरकते हुए ही वह पलटी मारकर नजर मिलाती, इशारा देती, पलकें उठाती और तुरंत कोई स्पेयर कलाकार भीड़ चीरकर नोट झट से उठा लाता. यह दृश्य किसी फिल्म जैसा लगता था. महिलाएं दर्शक दीर्घा में कम दिखतीं, क्योंकि संवाद कभी-कभी चटपटा और नृत्य थोड़े फूहड़ माने जाते थे. पर युवाओं के लिए यह आकर्षण का केंद्र थामंच पर नाटक चलता और बीच में जिंदगी खिलखिलाती थी.
…फिर समय बदला और रंगमंच भी
धीरे-धीरे यह नाटक कंपनियां गायब हो गईं.परंपरा टूटती गई. मनोरंजन के नए रूप आए टीवी, वीडियो, फिर इंटरनेट.लेकिन कला मिटती कहाँ है? अवतार बदलकर लौटती है.कुछ सालों बाद मेले में वैरायटी शो आने लगे. अब टिकट 5-10 रुपये की, दो-तीन डांस मतलब रिकॉर्ड एक्शन (बैक ग्राउंड में गाना बजता और डांसर सिर्फ लिपसिंग करते हुए डांस करती थी), और वही तालियों की छनछन.
महिदपुर सिटी का गंगावाड़ी का मेला तो इसका प्रमुख ठिकाना था, गोगापुर में भी कभी-कभार रंग जमता. आज की नज़र से देखें तो वो समय शायद सरल था, मनोरंजन सादा मगर दिलकश. न रात भर रीलों की खपत, न स्क्रीन का चकाचौंध बस स्टेज, कलाकार और दर्शक की धड़कन. क्या मज़ा था उन दिनों जहाँ 1 रुपये की टिकट में हंसी भी मिलती थी, इश्क भी, ड्रामा भी और ताली भी.आज जब याद आती है, लगता है. हमने सिर्फ नाटक नहीं देखे थे, एक पूरी संस्कृति देखते थे.
सहीकहा तब तो ₹1 की टिकट में भरपूर मनोरंजन हो जाता था