
रश्मि मृदुलिका, देहरादून (उत्तराखण्ड)
आज सरला बहुत खुश है। उसके प्यारे बेटे अमित के लिए बहुत अच्छे घर से रिश्ता आया है। लड़की पढ़ी-लिखी और सुंदर है, परिवार भी सभ्य और प्रतिष्ठित है। पिछले साल जब बेटे की नौकरी लगी थी, तभी से वह उसके लिए एक अच्छा रिश्ता ढूँढ रही थी। इकलौता बेटा है उसका — वो कोई रिस्क नहीं लेना चाहती। उसने पंडित जी से साफ कह दिया था — “पंडित जी, हमें कुछ नहीं चाहिए। बस लड़की संस्कारी हो। एक ही तो बेटा है मेरा, सारी उम्मीद उसी से है।”
पंडित जी ने अमीषा की फोटो दिखाई। उसे देखकर वह बहुत खुश हो गई थी। अमित को भी अमीषा की बड़ी-बड़ी आँखें भा गई थीं। बात आगे बढ़ी। मिलना-मिलाना हुआ। अमीषा शांत थी, बहुत कम बोल रही थी। ज़्यादातर बात उसके माता-पिता ही कर रहे थे। उसे थोड़ा अजीब लगा। उसके पति रमेश ने समझाया — “तुम ज़्यादा सोच रही हो।” उसे भी लगा शायद ऐसा ही है।
अमित और अमीषा में काफ़ी देर तक बात हुई। उसने बेटे को हँसते हुए आते देखा। लड़की भी मुस्कुरा रही थी। उसने इशारे से पूछा, तो बेटे ने हामी भर दी। अब वो खुश थी। सब अच्छा हो गया। जैसी बहू चाहती थी, वैसी ही बहू उसके घर आ रही थी।
सरला शादी की तैयारियों में जुट गई। एक-एक चीज़ उसने अपने मन से खरीदी। रमेश उसे चिढ़ाते — “तुमको तो अमित से ज़्यादा बहू का इंतज़ार है!”
“हाँ क्यों न हो! आखिर मेरी बहू नहीं, सहेली आ रही है। तुम्हें तो अपने काम से फुर्सत नहीं। मैं तो अपनी बहू के साथ शॉपिंग करूँगी!”
रमेश हँस पड़े। वो बड़बड़ाते हुए किचन में चली गई।
शादी के कार्ड छपकर आ गए। बहुत सुंदर बने थे। उसने बेटे को दिखाया। उसने कहा — “मेरी माँ की पसंद सबसे अच्छी है।”
शाम को अमित ने दबी आवाज़ में कहा — “माँ, कार्ड नये छपवा लेते हैं।”
वह चौंक गई — “लेकिन क्यों, क्या हुआ?”
“माँ, अमीषा को कार्ड पसंद नहीं आए। वो कह रही है ये ‘old fashion’ हैं।”
“अच्छा… ऐसी बात है तो बदल देते हैं।” सरला कुछ और कह नहीं पाई।
उसने बेटे के चेहरे पर अनमने भाव देखे। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।
जैसे-जैसे शादी का दिन नज़दीक आ रहा था, वैसे-वैसे उसका उत्साह बढ़ रहा था। वह दिन में भी सपने देख रही थी। अचानक उसने नोटिस किया — अमित कुछ बुझा-सा है। पहले की तरह चंचल नहीं रहा। उसका मन आशंकित हो गया। आजकल का समय हमारे समय जैसा कहाँ रहा!
“कहीं कोई बात तो नहीं?” उसने अमित से पूछा।
“तुम्हारे और अमीषा के बीच सब ठीक तो है?”
“हाँ माँ, सब ठीक है।”
“नहीं, कुछ तो है। देखो, मुझसे मत छुपाओ!” सरला ने बेटे का हाथ पकड़ते हुए कहा।
अमित रूआँसा होकर बोला — “वैसे तो सब ठीक है, लेकिन वो कभी बिना बात के नाराज़ हो जाती है। छोटी-सी बात पर बहस करती है। मुझे समझ नहीं आता कि उसका स्वभाव कैसा है।”
यह सुनकर उसका मन बैठ गया — “ये तुम क्या कह रहे हो, बेटा?”
“कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मैं उसके साथ निभा भी पाऊँगा या नहीं…” अमित उसकी ओर देखते हुए बोला। शायद कोई सहारा चाहता था।
“लेकिन बेटे, सारी तैयारियाँ हो गई हैं। कार्ड बँट गए हैं…” उसने बुझे मन से कहा।
रमेश बोला — “देखो बेटा, दो अलग लोग अलग सोच के होते हैं। कभी-कभार विचारों का मेल नहीं होता। आजकल के ज़माने में फिर भी मिलना-जुलना होता है। मैंने तो तुम्हारी माँ से शादी के दिन ही बात की थी!”
“जी पापा, आप ठीक कहते हो। लेकिन मुझे अमीषा का नेचर समझ नहीं आता। उसका मूड कभी भी उखड़ जाता है।” अमित ज़मीन की ओर देखते हुए बोला।
“अगर ऐसा है, तो रिश्ते के लिए ‘ना’ कह दो। अभी कुछ नहीं बिगड़ा है। ज़िंदगी तुम्हारी है, फ़ैसला तुम्हारा।” रमेश चिंतित होकर बोला।
सरला बोली — “लेकिन… रिश्तेदार क्या कहेंगे! सारी तैयारी हो गई! मैं बहू से बात करती हूँ।”
उसने फ़ोन लगाया। बहू बड़ी नॉर्मल होकर बात कर रही थी। उसने उल्टा अमित की शिकायत की — “देखो मम्मी जी, ये मेरी बात नहीं मानता…”
समधी-समधन से भी बात हुई।
“मुझे तो सब ठीक लग रहा।” उसने बेटे को समझाते हुए कहा — “आजकल के बच्चे भी अजीब हैं। इनके अंदर सहनशक्ति नहीं है।”
अमित कुछ नहीं बोला। लेकिन सरला ने उसके चेहरे पर बेचारगी के भाव देखे थे।
शादी धूमधाम से हो गई। उसने बड़े उत्साह से बहू का स्वागत किया।
पर बहू का मूड उखड़ा हुआ था। सरला बहू से जी भर बातें करने के लिए तरस रही थी।
पर बहू सारा दिन अपने कमरे में बंद रहती। अमित के चेहरे पर वह खुशी नहीं थी।
अगले दिन अमित और बहू गोवा घूमने चले गए। उसका मन शांत हुआ — कि शायद अब सब ठीक होगा।
एक महीने बाद दोनों घर लौटे।
बहू सीधे कमरे में चली गई। थोड़ी देर में दोनों के झगड़ने की आवाज़ें आने लगीं।
वो घबरा कर कमरे में गई। बहू सामान पैक कर रही थी।
“अभी तो आए हो। अब कहाँ जा रही हो, बेटा?”
“मैं अपने घर जा रही हूँ! मैंने इससे 20 हज़ार ही तो माँगे। मुझे शॉपिंग करनी है। लेकिन ये मना कर रहा है!”
उसने अमित की ओर देखा।
अमित रूआँसा होकर बोला — “माँ, गोवा में इतना पैसा खर्च हो गया था। कहाँ से दूँ?”
“देखो बेटा, सही तो कह रहा अमित। तुम थोड़ी रुक जाओ…”
“नहीं! कभी नहीं! अगर ये मेरा खर्चा नहीं उठा सकता था, तो शादी क्यों की? मैं इसके साथ नहीं रह सकती!”
कहकर अमीषा घर से निकल गई।
अमित सिर पकड़कर बैठ गया। सरला असहाय महसूस कर रही थी।
रमेश ने बहू के पिता को फ़ोन किया। उन्होंने साफ कह दिया — “गलती अमित की है। हमारी बेटी जो कहेगी वही होगा। ज़्यादा बोलोगे तो दहेज एक्ट लगा देंगे।”
सरला और रमेश सन्न रह गए।
एक हफ़्ते बाद बहू पूरा सामान लेकर चली गई। कोर्ट में केस चल रहा है। अमित ने कितनी कोशिश की।
पर अब रिश्ता नहीं बच सकता। बेटे को दुखी और पति को परेशान देखकर उसका मन रोता है।
काश! उसने सही समय पर सही फ़ैसला लिया होता — जबकि उसके बेटे ने अपनी समस्या बता दी थी।
आये दिन अखबार में ऐसी ख़बरें पढ़कर उसका मन बैठ जाता —
जहाँ दहेज के झूठे केस से परेशान होकर लड़के डिप्रेशन में चले जाते हैं… या आत्महत्या कर लेते हैं।
मोहल्लेवाले और रिश्तेदार भी उन्हीं को शक की नज़र से देख रहे थे।
इतने सालों का व्यवहार, मेल-जोल — कुछ भी मायने नहीं रखता था।
उन्होंने सबका साथ दिया था, पर आज वे ही दोषी ठहराए जा रहे थे।
उसने सोचा — वह अपने बेटे को इंसाफ दिलाकर रहेगी।
भले ही समाज और क़ानून अक्सर लड़की को ही सताई हुई मान लेते हैं।
वो अपने बेटे को इस तरह टूटने नहीं देगी।
उसने अमित को अपनी योजना बताई।
वो हैरान हुआ —
“माँ, क्या ये प्लान काम करेगा? अमीषा और उसके माता-पिता बहुत होशियार हैं!”
“ज़रूर काम करेगा बेटा। बस वैसा ही करना, जैसा मैं कहती हूँ।”
अमित ने अमीषा को फ़ोन किया — “एक बार मिल लो। तुम्हारे ही लाभ की बात है।”
वो हँसते हुए बोली — “हाँ, ज़रूर! वैसे भी तुम बचने वाले नहीं!”
शाम को दोनों एक कॉफ़ी शॉप में मिले।
अमीषा कुटिल मुस्कान से हँसी — “देखा? आखिरकार तुम मेरे पास गिड़गिड़ाने आ ही गए। सारे क़ानून मेरे हक में हैं!”
“देखो… मेरे माँ-पिताजी परेशान हैं। मैं बात को ज़्यादा नहीं खींचना चाहता। तुम्हें जो चाहिए बताओ। कोर्ट के बाहर ही समझौता कर लो। केस चलेगा तो सालों तक चलेगा।”
“ओह, अच्छा! ये तुमने समझदारी दिखाई!”
“ठीक है… मेरे नाम पर अपनी ज़मीन कर दो… और 25 लाख दो।”
अमीषा बेशर्मी से बोली।
अमित ने कहा — “ठीक है।”
अगले हफ़्ते कोर्ट में पेशी हुई।
अमीषा और उसके माता-पिता ने फिर आरोप लगाए।
लेकिन जब वकील ने अमीषा की वीडियो कोर्ट को दिखाई — तो उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई!
वो रो-रोकर कहने लगी — “मेरे खिलाफ इन्होंने साज़िश की है!”
पर अदालत सबूत मांगती है —
और सबूत साफ़ दिखा रहा था कि कौन ब्लैकमेल कर रहा है।
अदालत ने अमित के पक्ष में फैसला देते हुए, नए सिरे से केस ओपन करने का आदेश दिया।
वीडियो का संज्ञान लेते हुए पूरे प्रकरण की जाँच के आदेश दिए।
अब उन्हें न्याय की उम्मीद थी।
सबसे बड़ी बात — अमित के चेहरे पर चमक थी।
जैसे उसे नयी ज़िंदगी मिल गई हो।
उधर अमीषा और उसके माता-पिता के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था।
जैसे यकीन न हो रहा हो कि पासा कैसे पलट गया!
रिश्ता टूटा — और इज़्ज़त भी चली गई।
सरला बहू के पास आयी और बोली —
“काश! तुम मेरी बहू बनकर रहती… तो बेटी का सुख पाती।
हम तुम्हें पलकों में बिठाकर रखते।
पर तुमने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार दी।
अब भुगतो।”
अमीषा के चेहरे पर कुढ़न, गुस्सा, बेचारगी — हर तरह के भाव आ-जा रहे थे।
दरअसल — दोनों के मिलने से पहले ही
सरला ने मोबाइल को मेज पर रखे टिश्यू पेपर के बॉक्स में छुपाकर इस तरह रख दिया था
कि उनकी पूरी वीडियो बन गई।
और अपनी “होशियारी” में अंधी अमीषा को पता भी नहीं चला।
रमेश अपनी पत्नी की समझदारी से बहुत खुश था।
उसने अपने परिवार को इतनी बड़ी मुसीबत से निकाल लिया था।
सरला सोच रही थी — दोषी कौन है?
अमीषा? या उसके माता-पिता?
या समाज की वह सोच, जो एक बंधी-बँधाई धारणाओं से बाहर नहीं निकल पाती?
अन्याय किसी के साथ भी हो सकता है।
फिर न्याय के लिए — क्या पुरुष, क्या महिला?
उसका विश्वास है — समाज ऐसे मामलों में लड़कों के प्रति भी संवेदनशील होगा।
सही मुद्दा उठाया आपने कहानी के माध्यम से।