एक दिन कुछ बच्चों के बीच बैठी मैं पत्रिकाओं की और उसे पढ़ने की बात कर रही थी। उसी क्रम में मैंने उनसे संस्कृत पत्रिकाओं के बारे में पूछा तो वे हँस पड़े। बोले – “संस्कृत तो यूँ भी डेड भाषा है आंटी! उसकी पत्रिका कैसे निकल सकती है? और कौन पढ़ेगा?”
शायद वे सही कह रहे थे।
आज जब बोलियाँ समय के बहाव में सिर्फ एक भाषा अंग्रेज़ी और शहरीकरण के कारण मर रही हैं, तो वर्षों पहले की संस्कृत पत्रिकाओं को ये बच्चे कैसे जान सकते हैं? कैसे जान सकते हैं कि महर्षि पाणिनि की रची यह भाषा कई भाषाओं की जननी है, जिसे दशम मंडलों की भाषा कहा जाता है, वैदिक भाषा कहा जाता है और जिसे हम देववाणी कहते हैं। वर्तमान समय में यह भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है। भारत की छह शास्त्रीय भाषाएँ हैं—संस्कृत, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और उड़िया। यह आज हमारे लिए सिर्फ़ जानने का विषय नहीं, बल्कि गर्व का भी विषय है।
पर बात मैं संस्कृत पत्रिका की कर रही हूँ, जिसे शायद हममें से बहुत लोग नहीं जानते। क्योंकि न अब ये प्रचलन में हैं और न ही अब ये प्रकाशित होंगी, तो कैसे पढ़ी जाएँगी? सोचिए! जब अंग्रेज़ी और हमारे शहरीकरण के कारण हमारी बोलियाँ, हमारी भाषाएँ खो रही हैं, तो पत्रिकाएँ कैसे जीवित रहेंगी? संभव ही नहीं है। तो मैं बात कर रही हूँ संस्कृत पत्रिकाओं की, जिन्हें आज कोई नहीं जानता। आज संस्कृत एक ऐसा विषय है, जिसे या तो छोटी कक्षाओं में पढ़ा-पढ़ाया जाता है या फिर प्रतियोगिता में अंक लाने के लिए चुना जाता है।
एक समय था जब हमारी स्वतन्त्रता की लड़ाई में भाग लेने वाली विशिष्ट पत्रिका हुआ करती थी “संस्कृत-चंद्रिका” जिसके संपादक थे जयचंद विद्याभूषण। यह 1894 में कलकत्ता से प्रकाशित हुई थी। बाद में इसका प्रकाशन महाराष्ट्र से होने लगा और इसके संपादक हुए अप्पा शास्त्री राशिवडेकर। अप्पा शास्त्री एक असाधारण व्यक्तित्व के मालिक थे, जिनके पास अपनी गहन सोच, प्रखर बुद्धि और सच को कहने का साहस था। वे स्वयं भी संस्कृत में लिखते थे। उनकी कविताएँ मात्रभक्तिः, पंजरबद्धः शुकः, दासपरिणतिः, अथवा मातृशक्तिः जैसी महत्वपूर्ण रचनाएँ थीं, जो संस्कृत-चंद्रिका में प्रकाशित हुईं।
अप्पा शास्त्री ने उस समय के संस्कृत रचनाकारों को पत्रिका में प्रकाशित कर समाज के सामने लाया। यह पत्रिका अंग्रेज़ी दमन के समय के चाटुकारों का विरोध करती थी और विक्टोरिया की गलत नीतियों का भी निर्भीकता से प्रतिकार करती थी। यह उन्नीसवीं सदी का समय था, जब संस्कृत में पत्रिकाएँ निकालने का काम अपनी ऊँचाई पर था। इसके साथ ही द्विभाषी पत्रिकाएँ भी निकलती थीं, जिनमें दूसरी भाषा संस्कृत होती थी। इतना ही नहीं, हिंदी भाषा की पत्रिकाएँ भी संस्कृत की रचनाएँ प्रकाशित करती थीं। इसका सबसे पहला उदाहरण “उदन्त मार्तण्ड” है, जिसमें राष्ट्र के लिए लिखी जुगलकिशोर की रचना अक्सर पत्रिका की शोभा बनती थी। और हिंदी ही नहीं, मलयालम, मराठी भाषाएँ भी संस्कृत रचनाओं को अपनी पत्रिकाओं में प्रकाशित करती थीं।
इन सबमें “काशीविद्यासुधानिधि” का नाम संस्कृत भाषा की पत्रिका और पत्रकारिता में सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय है। इसने उस समय की पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति को चुनौती देने के लिए भारतीय सभ्यता और संस्कृति को फिर से परिष्कृत कर सामने रखा। इसके साथ ही अंग्रेज़ी सरकार की चाटुकारिता करने वालों और घुटने के बल अपने आत्मविश्वास को खो देने वालों के लिए भी कई पत्रिकाओं ने देश की विभिन्न भाषाओं के साथ ही संस्कृत में भी लिखा। विज्ञानचिंतामणिः, सहृदया, विद्योंदयः, अमृतवाणी, ज्योतिष्मती इनमें प्रमुख थीं।
सहृदया ने तो उस समय के प्रखर पत्रकार और चिंतक अप्पा शास्त्री के स्वदेशीआन्दोलनम् की रचनाओं को खूब जगह दी, क्योंकि ये रचनाएँ उस समय की राजनीति और समाज के भटकाव पर तीखा प्रहार थीं। काशीविद्यासुधानिधि ने तो उस परतंत्र समाज के शासन और सभ्यता को ही चुनौती दे डाली थी।
मुझे गर्व है अपने साहित्य, साहित्यकार और उन महान लोगों पर जिन्होंने किसी कुंठा, द्वेष अथवा देश के विरोध के लिए भाषा और साहित्य को नहीं अपनाया, बल्कि समाज और देश को जगाने के लिए, पुनर्जागरण के लिए चुनौती ली, कष्ट सहे।
यूं बिखराव तब भी था, विचारों का अलगाव तब भी था, पर उस समय अधिकांश के भीतर देश जी रहा था। पर आज ऐसा नहीं है। आज हमारे बीच हमारी बोली-भाषा, हमारे देश से ज़्यादा हम जीते हैं। और जिस समय लोगों के भीतर भाषा और देश से ज़्यादा व्यक्ति जीता है, तो एक दिन वह भी डूबता है और देश भी।
इसलिए संस्कृत के माध्यम से हमें एक बार फिर अपने उस अतीत को देखना आवश्यक है, जहाँ से हमारे मूल्यबोध और हमारी सोच को एक नया रास्ता मिल सके और हमारे बच्चे अपने अतीत के सुंदर पन्नों को पढ़ सकें।

रेणुका अस्थाना, भिवाड़ी (राजस्थान)
संस्कृत भाषा पर एक सामयिक लेख ।
इस भाषा में बहुत से शब्दों को मिलाकर लिखने की अनिवार्यता है जिसे ‘सन्धि’ और ‘समास’कहते हैं । व्याकरण के कठिन नियम भी हैं । इसलिए अच्छा अध्ययन ‘रटना ‘ पर आधारित हो जाता है., भाषा को आसान बनाना असम्भव हो जाता है क्योंकि सही व्याकरण का प्रयोग कठिन होता है । इसीलिए संस्कृत एक आम भाषा नहीं बन पाई ।
सच कह रही