वर्जित इच्छाओं की अपराधिनी…

आज-कल
लम्बे दिन
और छोटी रातों में
कई ख्वाब
एक-सी शक्ल लिए
आ रहे हैं

और दिन
बहुत देर से
अलसाई-सी शाम में
तब्दील हो रहा

नहीं-नहीं
ये खूब तेज
चुहचुहाती गर्मियों वाले दिन नहीं

ये तो बस अभी-अभी आये
वसंत के पीले दिन हैं
जो अचानक
इस लॉक डाउन में
प्रौढ़-से हो गए हैं

इस बार
होली के सतरंगी
दिनों के बाद
जाने क्यों इतने
बेरंग से हो गए हैं
दिन-रात

अपने जन्म से
अब तक
मैंने कभी भी
वसंत को यूँ वीतरागी होते
नहीं देखा था

वसंत के दिनों में
एक स्लेटी-सी सोच
भूरे-भूरे से हुए
मन के मौसम पर
भादो की बारिश-सी
उमड़ आ रही हैं

कुछ य़ादें
टीन का छप्पर हुई जा रही हैं
टप-टप को
ऐसे कब सुना था

शायद
नौवीं ज़मात में
अमृता प्रीतम की
किताबों में
मुँह छिपाये

अम्बर की
एक पाक सुराही
बादल का
एक ज़ाम उठाकर
घूँट चाँदनी की पी है
हमने ….

पढ़ती हुई
एक ठेठ कस्बाई लड़की
इससे पहले
कि उस घूँट को
हलक में उतारती
उसे दसवीं तक सब कुछ
समझा दिया गया था
कि क्या,
कितना करना है
क्या सुनकर भी
अनसुना कर देना है
कौन-सी चिट्ठियाँ
बिना पढ़े फाड़ देनी हैं
और
कहाँ,
कैसे नज़र फेर लेनी है

और तभी
मन का छप्पर
कंक्रीट हो गया

कई भादो बीते ..
पर टप- टप की कोई
आहट नहीं सुनी पर
अब सुन रही हूँ

वसंत के इस मौसम में
हर दो दिन बाद अचानक से
बादल खूब टूट-टूटकर बरस रहे
और वो टूटन
दिल तक आ रही

इन लम्बे दिनों में
वसंत के
आखिरी दिनों में
पाँच सालों में पहली बार
मैं अपने घर के
तीसरे माले की छत से
रोज शाम देख रही हूँ
खूब साफ होती
और रौशनी में नहाई मसूरी

और ताज्जुब कर रही हूँ
कि पिछले पाँच सालों में
कभी अपनी टेरिस से
मसूरी को
ऐसे क्यों नहीं
देख पाई ..

आज
बैंक जाने के लिए
इतने दिनों बाद
जब एकदम शांत-सी
सड़क से गुजर रही थी
तो रास्ते में दिखे
खूब सारे
बैंजनी फूल

पहले भी रहे होंगे
पर जाने की तेजी में
कभी गौर नहीं किया था ..

आजकल
छोटी रातों में
अजीब से
बैंजनी
सुर्ख
सपने आ रहे
ठीक वैसे
जैसे
कॉलेज के दिनों में
मेरी खिड़की पर
रोज़ सुबह रखे मिलते थे
कुछ बैंजनी फूल ..

सोचती हूँ
उपदेश और अनुशासन
मानने वाली
मुझ-सी लड़कियाँ
क्या अपनी वर्जित इच्छाओं की
अपराधिनी नहीं

क्या कई कृत्य
इतने पवित्र नहीं होते
कि उनके न होने का
उम्र भर अफसोस हो।

रंजीता सिंह “फलक”, प्रसिद्ध लेखिका, छपरा (बिहार)

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