शायद ये इत्तेफ़ाक ही था…

सरिता सिंह “ नेपाली “ रामनगर , बेतिया पश्चिम चंपारण ( बिहार )

शायद ये इत्तेफ़ाक ही था…
सामने मेरे हया का लिबास पहने एक सभ्रांत महिला गुमसुम-सी बैठी थी।
उदासियों ने जैसे उसके खूबसूरत चेहरे का नूर छीन लिया था।

ट्रेन धीरे-धीरे अपनी रफ़्तार पकड़ रही थी।
उसके चेहरे पर चाहे बिना मेरी नज़र टिक गई।
उसकी ख़ामोशियाँ मुझे सालने लगीं।
न जाने क्यों उसकी रूह से मेरी कोई पुरानी पहचान-सी महसूस होने लगी।
बस यूँ ही वह बहुत आत्मीय लगी।

अचानक पूछ लिया
“चाय लेंगी आप?”
उसका जवाब इंकार था।

फिर धीरे-धीरे बातें हुईं… और वह मुस्कुरा दी।
ऐसा लगा उसकी आँखें मुझसे कुछ कहना चाहती हैं,
मानो अपने उदास लम्हों को इंद्रधनुषी रंगों से सँवार देना चाहती हो।
मगर नियति ने उसे शायद कोरा ही छोड़ देने का फ़ैसला कर लिया था;
या फिर उसने उदासियों के साथ कोई पुरानी रिशेदारी कर ली थी।

सवालों के घेरे में उसका वजूद था,
और मैं उन सवालों से वंचित
क्योंकि मुझे कोई हक़ भी तो नहीं था
कि मैं उससे उन सवालों का जवाब माँग सकूँ।

फिर कभी हमारा मिलना न हो सका…
हम मुसाफ़िर थे
हमारा साथ तो अपने-अपने स्टेशनों पर जाकर ही ख़त्म होना था।

उम्र का तीसरा पड़ाव आ गया,
पर मेरे ज़ेहन में उसका उदास-सा चेहरा
अब भी ज़िंदा है… और महफ़ूज़।

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