शरीर नश्वर, आत्मा अमर

ऊषा भदुला दीदी (ब्रह्माकुमारी), नई दिल्ली

जब प्राणी शरीर छोड़ता है तो हर एक के मुख से यही निकलता है कि उसकी आत्मा को शांति मिले। यह सिद्ध करता है कि आत्मा होती है और साथ ही यह भी कि वह इस दुनिया में कहीं-न-कहीं अशांत थी।

वैज्ञानिक भी ऐसा प्रयोग कर चुके हैं, जिसमें उन्होंने एक काँच के संदूक में मरणासन्न मनुष्य को रखा। वह चारों ओर से बंद था। जैसे ही उसने प्राण त्यागे, अचानक वह काँच का संदूक टूट गया। इससे यह सिद्ध हुआ कि कोई शक्ति है जो इस देह को चला रही थी। जैसे ही यह देह निष्क्रिय हुई, वह शक्ति अर्थात आत्मा उस देह को छोड़कर अपनी अगली यात्रा की ओर उड़ चली।

आत्मा हमारे मस्तिष्क के बीचों-बीच, या यूँ कहें कि हमारी भृकुटि के मध्य निवास करती है और पूरे शरीर को नियंत्रित करती है। मन और बुद्धि को चलाने वाली यही आत्मा है।

यह आत्मा बिंदी स्वरूप है। हम सभी माथे के बीचों-बीच बिंदी लगाते हैं और पूजा का तिलक भी यहीं लगाया जाता है। यह सिद्ध करता है कि यह स्थान सर्वोच्च है और हमारी आत्मा भी इसी स्थान पर स्थित होकर पूरे शरीर की स्वामिनी है।

शरीर पाँच तत्वों जल, अग्नि, वायु, आकाश और धरा से मिलकर बना है। जब शरीर निष्क्रिय हो जाता है तो हम कहते हैं कि यह मिट्टी पाँचों तत्वों में समा गई। फिर सोचिए, आत्मा कहाँ गई? जी हाँ, आत्मा अजर-अमर है। वही हमारे कर्मों का हिसाब-किताब रखती है।

अब आप कहेंगे आत्मा का पिता कौन है? शरीर का तो कोई शरीरधारी ही होता है, जो विकार से उत्पन्न हुआ। लेकिन आत्मा का पिता भी आत्मा जैसा ही होगा बिंदी स्वरूप। जैसे बिंदी स्वरूप आत्मा दिखाई नहीं देती, वैसे ही उसका पिता भी निराकार होगा।

आत्मा को हम महसूस कर सकते हैं, उसी तरह उसके पिता को भी महसूस किया जा सकता है हवा की तरह।

शरीर के तो अलग-अलग पिता होते हैं, अलग-अलग माता होती हैं। जो इस जन्म में माता-पिता हैं, वे अगले जन्म में कोई और देहधारी होंगे। यहाँ एक बात स्पष्ट कर दूँ कि आत्मा अजर-अमर है, निराकार है और आत्मा को बनाने वाला एक ही है परमपिता परमेश्वर। हम कहते भी हैं .“हे परमपिता परमेश्वर, आओ और हमें दुखों से छुड़ाओ।” यह सिद्ध करता है कि हम सभी आत्माओं का माता-पिता एक ही है।

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