निमाड़ी का दर्द: पद्मश्री जोशीला की अधूरी लड़ाई

इंदौर से वरिष्ठ पत्रकार लाइव वॉयर न्यूज के लिए कीर्ति राणा की रिपोर्ट
निमाड़ी भाषा को लोकभाषा का दर्जा दिये जाने के लिये दशकों से संघर्ष कर रहे जगदीश जोशीला (खरगोन) को इस बात का दुख है कि सरकार निमाड़ी की अनदेखी करती आ रही है। अब तक 56 से अधिक किताबों में 28 निमाड़ी भाषा में लिख चुके साहित्यकार जोशीला को भले ही इस भाषा का शब्दकोष बनाने पर पद्मश्री से सरकार ने सम्मानित किया हो किंतु उनके मन में टीस है कि मालवी सहित अन्य चार भाषाओं को तो लोकभाषा मान लिया गया लेकिन निमाड़ी आज भी बोली ही मानी जा रही है।
अभ्यास मंडल की शीतकालीन व्याख्यानमाला में ‘लोकभाषा संरक्षण की अनूठी पहल’ विषय पर संबोधित करते हुए जगदीश जोशीला (खरगोन) ने कहा सवा तीन सौ साल पहले भक्तिकाल में संत सिंगाजी ने निमाड़ी में भक्ति गीत गाए।स्वतंत्रता के बाद भक्तिकाल के बाकी कवियों को सम्मान मिला लेकिन संत सिंगाजी के साथ भेदभाव हुआ। 19 सितं 1953 में निमाड़ लोक साहित्य परिषद बनाई, अध्यक्ष विश्वनाथ खोड़े के नेतृत्व में तीन-चार अधिवेशन करने बाद भी निमाड़ी को मान नहीं मिला। 1980 से लगातार तीन बार लोकदल से खरगोन का टिकट मिला, तीन बार लोकदल से टिकट मिला, लड़ा भी और महसूस किया कि निमाड़ी भाषा हीन ग्रस्त रही।
इस हीनता को अनुभव किया तो 1990 से उज्जैन में टेपा सम्मेलन की तर्ज पर निमाड़ में खापा सम्मेलन शुरु किया, निमाड़ी भाषा से जुड़े कई काम किये। राजनीतिक रूप से हटकर स्वतंत्र रूप से सम्मेलन शुरु किया तो खापा सम्मेलन नहीं कर पाए। 2001 में सनावद वाले जगदीश विद्यार्थी ने कहा संस्था का नाम-स्वरूप बदलते हैं। मैंने पहला और अंतिम उपन्यास निमाड़ी में लिखा। कहानी संग्रह निमाड़ी में लिखा, लघु कथाएं लिखी, अनुवाद किया, दोहे लिखे। साहित्यकारों को बताने का प्रयास किया कि हमारी निमाड़ी समृद्ध है लेकिन सार्थक प्रयास नहीं हुए।
अखिल निमाड़ लोक परिषद के नाम से 2001 में पंजीयन कराया। मालवी लोकभाषा बन चुकी थी जबकि निमाड़ी बोली ही रही। लोकभाषा बनानी है तो शब्दकोष बनाना होगा। महेश्वर के सम्मेलन में शरद पगारे, उपाध्याय जी आदि निमाड़ी साहित्यकार आए। सात सदस्यीय शब्दकोष-व्याकरण समिति बनाई। सब लोगों से निमाड़ी के शब्द बुलाए। तीन वर्षों में तीस हजार शब्दों वाला शब्दकोष तैयार किया। 4500 पेज वाले शब्द कोष के लिये 2009 में साढ़े उन्नीस हजार रु एकत्र हुए।ललित नारायण उपाध्याय ने प्रयास किए। रात के समय शब्दों को संग्रहित किया, सार्थक अर्थ निकाले। सतत नौ बार प्रूफ रीडिंग करना पड़ी । प्रकाशकों ने दो लाख रु प्रकाशन खर्च बताया।
भागीरथ कुमरावत ने, खरगोन के विधायक प्रभुलाल महाजन, बसंत निरगुणे ने सहयोग किया। तब लक्ष्मीकांत शर्मा संस्कृति मंत्री थे, उन्होंने कपिल तिवारी, श्रीराम तिवारी को बुलाया 2010 में निमाड़ी शब्दकोष प्रकाशित हुआ। सारा पुलिंदा एकत्र कर भारत सरकार को भेजा। वहां से जवाब मिला कि राजभाषा को मान्यता देना राज्य सरकार का काम है। 2010 में राज्य सरकार को आवेदन दिया, इन पंद्रह वर्षों में जवाब तक नहीं मिला। जबकि मालवी भाषा सहित अन्य चार भाषाओं को मान्यता मिल गई। पांच हजार हस्ताक्षरों वाला आवेदन पत्र दिया लेकिन संत सिंगाजी के बदले क्रांति सूर्य टंट्या भील विवि नाम दे दिया।
हमने निमाड़ के महापुरुष तलाशे जो जन नायक रहे जो लोक देवता के रूप में पूजे जा रहे हैं। इन चारों आदि शंकराचार्य, दूसरे संत सिंगाजी, निमाड़ की माता अहिल्याबाई, चौथे टंट्या भील के जीवन पर सात वर्ष तक शोध कर के उपन्यास प्रामाणिक जीवनी लिखी। 2003 में गोगांवा में बड़ा खापा सम्मेलन किया, तत्कालीन डिप्टी सीएम सुभाष यादव ने कहा आप के उपन्यास के आधार पर टंट्या को किताबों से लुटेरा-डाकू से हटाकर लोक देवता स्थापित किया। अमझेरा के शासक रहे बख्तावर सिंह जिन्हें इंदौर में फांसी हुई उन पर उपन्यास लिखा। इतना काम करने पर भारत सरकार की मुझ पर नजर पड़ी, निमाड़ से पहला पद्मश्री सम्मान मुझे मिला लेकिन अफसोस है कि निमाड़ी को आज तक लोकभाषा का दर्जा नहीं मिला, मैं संकल्प लेता हूं मरते दम तक इसके लिये प्रयास करता रहूंगा। जोशीला ने निमाड़ी भाषा में ‘वाट बता सईसाट’ कविता भी सुनाई।
🔹सोशल मीडिया ने लोकभाषा का माहौल बनाया है
अध्यक्षता कर रहे पत्रकार प्रवीण खारीवाल ने कहा स्व कल्याण जैन के यहां मामा बालेश्वर दयाल जी का आना जाना लगा रहता था। वो भीली भाषा के विकास के लिये समर्पित रहते थे। उन्हीं की तरह जोशीला जी का निमाड़ी भाषा के प्रति समर्पण है। सोशल मीडिया-रील्स ने लोकभाषा को फिर से माहौल बनाया है।
वक्ता परिचय दिया हरेराम वाजपेयी ने। स्वागत किया शरद सोमपुरकर ने, डॉ मनीषा गौर ने। संचालन किया कुणाल भंवर ने। स्मृति चिह्न भेंट किया पत्रकार अनिल कर्मा और पर्यावरणविद डॉ एसएल गर्ग ने।
बहोत बहोत बधाई आदरणीय 🙏🙏🙏🙏🙏