
सुरेश परिहार, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
ये कहानी है, जब महिदपुर रोड पर छोटी-छोटी खुशियों का अपना ही संसार था. उस जमाने में शंकर सेठ की होटल तीसरी बड़ी होटल थी. सुबह-सुबह जब शहर नींद से जागता, वहीँ डम्प होते थे इंदौर से आने वाले अखबार. नईदुनिया, स्वदेश, अवंतिका, नवभारत, भास्कर, ब्लिट्ज हर अखबार अपनी कहानी लिए पहुंचता.
बचपन से ही मुझे फिल्मों का शौक रहा. नए पोस्टर, नई कहानियाँ, नायकों की दुनिया सपनों की उस दुनिया में मैं हर दिन डुबकी लगाना चाहता था. लेकिन घर पर अखबार नहीं आता था. तो मेरी सुबह की शुरुआत होती थी शंकर सेठ की होटल से.
पहले दिन वहाँ पहुँचते ही मुझे समझ आया बिना किसी परिचय के पेपर तक हाथ नहीं लगाया जा सकता. मैं खड़ा रहता, दिल धड़कता, किसी बड़े को देखने के लिए इंतजार करता. जैसे ही कोई अखबार खोलता, मैं चुपचाप उसका वह पन्ना पढ़ लेता, जहाँ फिल्मों के नाम और उनके शो टाइम्स लिखे होते. पढ़कर लौट आता, जैसे किसी खजाने की चोरी कर आया हूँ.
दिन-प्रतिदिन जाना, वहीँ बैठना, धीरे-धीरे पहचान बनने लगी. रामनिवास मंडोवरा काकाजी, कालू दा और चंद्रकांत जोशी जैसे लोग अब मेरे परिचित बन गए. उन्होंने मुझे छोटे-छोटे काम सौंपे. अखबारों के बंडल बनाना, गांवों में नाम लिखना. लेकिन मेरे लिए असली खुशी वह थी कि अब मैं अखबार के हर पन्ने को खुलकर पढ़ सकता था.
शंकर सेठ पिताजी के दोस्त थे. इसलिए होटल में मुझे बैठने के लिए मना नहीं किया गया. बस एक शर्त थी.टेबल पर छलकी चाय और पानी में पेपर गीला नहीं होना चाहिए. यह छोटी-सी शर्त भी मेरे लिए स्वर्ग जैसी थी. धीरे-धीरे, हर रोज अखबार पढ़ने की आदत ने मुझे अपनी गिरफ्त में ले लिया. वह सिर्फ आदत नहीं थीएक जुनून बन गया. हर दिन वह पल जब मैं पेपर की दुनिया में खो जाता, मेरे लिए कुछ खास था. वहीँ से मैंने अपने पहले दोस्तों से मुलाकात की चंद्रकांत जोशी, नागेश्वर तिवारी. वहीं से पत्रकारिता की छोटी-छोटी खुराक मेरे अंदर उतरने लगी.
आज भी जब मैं उन दिनों को याद करता हूँ, तो लगता है कि शंकर सेठ की होटल केवल एक जगह नहीं थी. वह वह मंच थी, जहाँ बचपन की जिज्ञासा और सपने अखबार के पन्नों में उभरते थे. वह वह जगह थी, जहाँ मुझे पहली बार महसूस हुआ कि शब्दों की दुनिया भी हमारी दुनिया जितनी ही बड़ी और सुंदर हो सकती है. और शायद, यही जगह थीजहाँ एक छोटे लड़के ने अपने सपनों की पत्रकारिता की शुरुआत की.
वाह👏👏 वह यादें जहां संघर्ष की शुरुआत होती है आगे जाकर सपने हमेशा पूरा करती है आपने बहुत सुंदर तरीके से उन्हें लिखा वह जगह आज भी आबाद है उन्ही यादों से जब भी वहां जाते हैं एक चलचित्र सा चलने लगता है आंखों में….
अखबार पढ़ने के लिए इतनी जुगाड़? सही कहा है – ” जहां चाह वहां राह ” आप अपनी चाह के रास्तों के लिए प्रयासरत रहे….. प्रेरणा दायक लेख।
Sahi kaha aapne jaha chah vaha rah.niklegi
Bachpan gili mitti sa jesa caha bante gaye.bachpan ke kuch shok kuch adate kb aage ja kar zindagi ko badal deti h yahi aap n bataya hai ..very nice