“मौन दरिया, बोलती रात”

सोचती हूँ — क्या कहूँ, किससे कहूँ, कितना कहूँ।
कुछ कहने–सुनने, रचने–गढ़ने की भाषा भी तो मौन है।
सुन्न पड़े अवयव सारे, अब किसका यहाँ कौन है?

किसका कितना बचा है “पानी”, किसको फ़िक्र!
अपनी ढपली, अपना राग — सबकी अपनी रवानी है।
बहते जाना, बस बहते जाना — जीवन मौन कहानी है।

दरिया के उस पार का सन्नाटा भी कुछ कहता है,
गहन इशारा करता है — मत ठहर, कहीं आगे बढ़ जा।

सोचती हूँ, दरिया से भी क्या कहूँ, कितना कहूँ।
भाषा भी तो मौन है, किसका यहाँ कौन है?

रेणु राय, प्रसिद्ध लेखिका, वाराणसी

One thought on ““मौन दरिया, बोलती रात”

  1. हार्दिक बधाई रेनू maam
    सुंदर दार्शनिक रचना। सच पूछो तो हर शोर में एक गहरा मौन है बस हम शोर को सुन पाते हैं। जिस समय से मौन महसूस करना शुरू कर देते हैं शोर ख़ुद -ब- ख़ुद शांत हो जाता है।

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