माँ का रसोईघर

शारदा कनोरिया, शुभा, प्रसिद्ध लेखिका, पुणे

चूल्हे की आँच में तपकर,
माँ ने जीवन को महकाया है।
आटे की लोई में जैसे,
अपने सपनों को बेल लगाया है।

सारी थकान भूल जाती है,
जब थाली में खुशबू भर जाती है।
परिवार का हर कौर खाते ही,
उसके होठों पर मुस्कान सज जाती है।

भूख से पहले तृप्ति उसे मिलती है,
जब बच्चों की आँखें चमक उठती हैं।
साधारण सब्ज़ी भी अमृत बन जाती,
क्योंकि उसमें ममता पिघल उठती है।

माँ जानती है
खाना सिर्फ़ शरीर का ईंधन नहीं,
यह घर का प्रेम है,
जिससे परिवार जीवित और आनंदित है।

उसके हाथों में स्वाद नहीं, आशीर्वाद है,
उसके दिल में बस परिवार का वास है।
रसोई उसका तपोवन है,
जहाँ वह हर रोज़ निस्वार्थ यज्ञ करती है।

माँ खाना बना रही है…
न सिर्फ़ भूख मिटाने को,
बल्कि अपने आनंद को बाँटने को।
यही तो उसकी पूजा है,
यही उसका संसार है।

3 thoughts on “माँ का रसोईघर

  1. वाह। मां की ऐसी प्रजाति अब विलुप्त होती जा रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *