मन का डेमेंशिया

सुरेखा अग्रवाल स्वरा, प्रसिद्ध साहित्यकार

सोचो, हम क्या दे सकते हैं किसीको। है क्या हमारे पास ऐसा जो हम किसीको भी बिना सोचे दे सकते हैं। सोचने में बेशक वक्त लीजिए, भरपूर वक्त ….कोई पाबंदी नहीं है समय की। हम मनुष्य बात-बात पर विचलित होते हैं, क्रोधित होते हैं। क्योंकि हम डरते हैं। सब जानते हुए भी महफूज़ होने की बात करते हैं। जानते हुए कि कुछ भी महफूज़ नहीं है। फिर भी लगे रहते हैं। यह मोह है .हम मानने को ही तैयार नहीं कि यह ज़िंदगी जो है, यह स्थाई नहीं है, फिर भी उम्मीद करते हैं।स्वप्न, हादसे, बीमारियां, ख़ुशी, दुख, किस्से ..अपने, पराए, सब। यहाँ तक कि अपनी यादें भी। सहज तरीका है, सब चला जाता है ….आप, मैं। रह जाती हैं स्मृतियाँ. यह स्मृतियाँ औरों के लिए शेष रह जाती हैं, हमारे लिए नहीं। बेहतर जानते हैं क्यों? क्योंकि हम अशेष और विशेष नहीं रहते उसके लिए। हम गए …सब खत्म।चलिए, तो वक्त हो गया मेरे प्रश्न का उत्तर देने का। जानती हूँ आप सब अभी भी उलझे हैं।

एक बात कहूँ …बहुत कुछ है हमारे पास निःस्वार्थ मन से देने को। पर हम कंजूसी कर जाते हैं। जैसे को तैसा सोचने वाले, हम कुछ सकारात्मक जल्दी सोच ही नहीं पाते। हम भूल नहीं पाते। डेमेंशिया जैसा रोग हम पाल नहीं पाते निजी और वास्तविक ज़िंदगी में।

हम भावनाओं को पकड़कर बैठ जाते हैं। बुरे के साथ उस जैसा बन जाते हैं। आक्रोश को प्राथमिकता देते वक्त हम कई नकारात्मक ऊर्जा को साथ लेकर चलते हैं। नतीजा: प्रेम का रूप शिफ़र हो जाता है, उसकी ऊर्जा खत्म हो जाती है।

आत्मसम्मान और अहम सर चढ़कर बोलने लगते हैं, जहाँ अहम का स्थान बढ़ जाता है। और वह हमें भी, जिसे हम पसंद नहीं करते, उसकी कैटगरी पर लाकर खड़ा कर देता है। और equation बराबर हो जाती है।

डेमेंशिया यह बीमारी वाकई में rare होती है। उम्र के साथ बढ़ती है। हम चीज़ों को भूलने लगते हैं, समय भूलते हैं, आसपास को भूलने लगते हैं, खाना, नहाना …हर चीज़ भूलने लगते हैं। फिर स्मृतियाँ कहाँ शेष रही? हम अस्तित्व भूल जाते हैं, हम हम ही नहीं होते।सब बीमारियों का इलाज है। पर यादाश्त ही नहीं, तो कौनसी दवा दीजिएगा? कौनसी स्मृतियाँ याद?

तो बेहतर है, न, अगला जैसा है उसे वैसा ही छोड़ दें। क्यों न हम बदलें? स्वयं के विचारों को बदलें? अपना बेस्ट दें। जो लोग याद कर सकें हमारे जाने के बाद। हम किसीको नहीं बदल सकते, और हम उनकी तरह हो नहीं सकते। तो थोड़ी सी यह डेमेंशिया बीमारी पाल ले। बिगड़ेगा कुछ नहीं। हांजी, थोड़ी यादाश्त ज़रूर चली जाएगी.. सोचें फिर, यह बीमारी सोच-समझकर गोद लें..वरना खामखाँ मुझे दोष देते रहेंगे। भूल जाइए उनको जो आप जैसे नहीं हैं। छोड़ दीजिए उन्हें उनके हाल पर, जो आपके हाल-चाल से मतलब नहीं रखते। माफ़ कर दीजिए उन्हें जो आपको deserve नहीं करते।

One thought on “मन का डेमेंशिया

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *