मन का अंतरिक्ष… 

न जाने कितनी उल्काएं 

प्रवाहित हो रही थी 

मन के अंतरिक्ष में 

उनके अजस्त्र वेग से

कितनी ही बार बनी 

टकराव की स्थिति

घर्षण की संभावना से

बरबस क्षीण होती जाती है

उनकी गति

मानो

घाटियों पर्वत पत्थरों को काटते

प्रचंड आवेग के साथ बहते हुए

समतली पर आते आते

अपनी ही रफ्तार को धीमे करते

किसी छोर को भिगोते भिगोते

स्निग्ध हो जाती है कोई नदी …

मानो 

उत्साह उमंग हुलास से युक्त

नए घर में पदार्पण कर चुकी 

भोर के प्राजक्त सी कोमल 

अपने ही आंगन में 

चुपके से गीर जाती है और

शांत हो जाती है कोई परिणीती

डॉ. मीना मुक्ति, सुप्रसिद्ध साहित्यकार

2 thoughts on “मन का अंतरिक्ष… 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *