
उषा कंसल, वरिष्ठ लेखिका, बंगलौर
साम्राज्य जादू-भरा होता है हमारी आँखों का।
वाणी हो जाती अशक्त हमारी कई स्थलों पर।
जब भावों को अभिव्यक्त न करे कोई भी अंग,
आँखें वह तरकश हैं, जिससे तीर निकलकर
बिद्ध कर देते हैं विपक्ष के हमारे नैना, सभी पैंतरे।
ऐसी गुपचुप बातें करें कई नयन, बीच भवन में,
उन रहस्यमयी बातों को कोई भाँपे भी कैसे?
क्रियाकलाप गिन लो आँखों के गणित फेल है।
कह देती हैं आँखें गति मन के भाव-परिवर्तन की।
दिल-दिमाग छेद देती हैं कुत्सित, कपटी आँखें।
है कभी शिकायत, कभी शरारत अद्भुत क्रीड़ा।
कहीं भोलापन, कहीं कुटिलता; है मस्ती शर्मीली।
इच्छाशक्ति दृढ़, इनकी ढुलमुल नीतियाँ देखो।
क्या दिल के कोष में छुपा भेद खोलती हैं आँखें?
मनुहार-भरी भंगिमा, कभी अपमान व दुत्कार।
विद्रोह प्रकट करती हैं आँखें, मौन हो जिह्वा जब।
समस्त मनोवेग कहने में सक्षम होती हैं आँखें।
युवा उमंगें, खिलखिल शैशव, निश्छल बचपन।
चुगली सबकी करती हैं ये कुशल गुप्तचर आँखें।
इनको मत उलझाना किसी से, अशांति मिलेगी।
बिना कुछ कहे सब कुछ कह देते नयन
काम नहीं आता फिर शब्दों का चयन
बिल्कुल सही कहा आपने नैनो की ये बात नैना जाने है।