
विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद
मम्मी, मेरा तकिया कहाँ है…?”
तभी छोटी बहन बोल उठी—“मेरा वाला खिलौना…?”
जवाब का इंतज़ार किए बिना ही मैंने दूसरा सवाल कर दिया“खिड़की के पास तो मैं बैठूँगी। फिर रात में सोएँगे कहाँ…?”
मम्मी ने बिस्तरबंद पर छोटी बहन को बैठाकर कहा “इसमें तुम्हारे सारे सवालों के जवाब बंद हैं।”
मैंने आश्चर्य से मम्मी को देखा और पूछा-“ये क्या है…?”
मम्मी ने कहा-“बीटा…”
“बीटा… यह कैसा नाम है…?”
पर जेहन में तभी से यह नाम बैठ गया।
क्या आपको भी यह नाम चिर-परिचित लगता है?
पहले की सफल यात्रा बिना “बीटा” के अर्थात जिसका शुद्ध नाम “बिस्तरबंद” है अधूरी होती थी। एक मोटा कपड़ा या कैनवस का थैला, जिसमें बिस्तर का सारा सामान बाँधकर सफ़र पर निकला जाता था। बिस्तरबंद में इतना सामान आ जाता था कि पूछो मत।
एक लंबी, मोटी, हरे रंग की आयताकार दरी, जिसके ऊपर-नीचे दोनों साइड तकिए के आकार के बॉक्स बने होते थे। उनमें इतनी जगह होती थी कि तकिया, चद्दर, कंबल और पतली गद्दी भी आ जाती थी। गद्दी को दोनों ओर फैलाकर, बीच में चद्दर बिछाकर, तकिया सिरहाने लगाकर ट्रेन में भी घर की तरह सोने का आनंद लिया जाता था।
इसके अलावा एक साइड में कपड़े, एक्स्ट्रा बेडशीट वगैरह भी रखी जाती थी। जो भी सामान ट्रंक में नहीं आता, वह बिस्तरबंद में समा जाता। बिस्तरबंद को बाँधना भी एक कला थी, जो हर किसी के बस की बात नहीं थी। सारा सामान डालकर हाथों से रोल करते हुए दोनों साइड बीच में लाकर फोल्ड कर देते और फिर उनमें बने होल से रस्सी खींचकर टाइट की जाती, जिसमें अच्छी-खासी ताकत लगती थी।
पैक होने के बाद वह फूलकर ड्रम जैसी शेप में आ जाता। पकड़ने के लिए इसमें कपड़े के बने हैंडल होते थे, जिन्हें कई बार कुली हाथ में लटका लेते। मैं हैरानी से देखती थी कि कुली कितनी आसानी से इन्हें हाथों में लटकाकर चल पड़ते थे।
आज बिस्तरबंद की जगह एयरबैग ने ले ली है। आधुनिक बैग इतना सामान नहीं समेट पाते। आजकल गुमनामी की ज़िंदगी जी रहे इन बिस्तरबंदों को हमने बहुत क़रीब से देखा है।
पुरानी यादें ताजा कर दी आपने विजया जी ।