
मंजू लता, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली
बात छोटी थी, ज़ख़्म लेकिन गहरा दे गई आजीवन जिसका मीठा-मीठा दर्द सालता रहा। शेफाली नहीं चाहती थी कि यह दर्द कम हो; वह उसे उम्र भर सीने से लगाए रखना चाहती थी।
दिल्ली से पटना जाने के लिए उस समय लोग अक्सर तूफ़ान मेल या फिर डीलक्स से जाना पसंद करते थे।
शेफाली अपनी माताजी के साथ दिल्ली आई हुई थी। वहाँ उसके बड़े भाई विदेश मंत्रालय में कार्यरत थे। दो महीने रहने के बाद उन दोनों को पटना वापस लौटना था।
बड़े भाई साहब को किसी ख़ास काम की वजह से छुट्टी नहीं मिलने वाली थी, अतः उन्होंने अपने दोस्त करुणाकर से कहा कि वह उनकी माँ और बहन को पटना पहुँचा दे। करुणाकर भाई का लंगोटिया यार था. वह कैसे मना करता। वैसे भी करीब रोज़ ही भाई के यहाँ उसका आना-जाना था।
इन दो महीनों में शेफाली उसके लिए आकर्षण का केंद्र बन चुकी थी। कहीं-न-कहीं वह उसके हृदय में घर बना चुकी थी। करुणाकर ने इस बात को कभी ज़ाहिर नहीं होने दिया। उधर शेफाली भी मन-ही-मन उसे चाहने लगी थी। जब दो जवान दिल आसपास हों तो प्यार का बीज पड़ना तय था। शेफाली महज़ सोलह साल की थी. इतनी परिपक्व नहीं हुई थी कि समझ पाती क्या अच्छा है, क्या बुरा।
योजना के अनुसार तूफ़ान मेल में टिकट बुक कराया गया। दो बर्थ नीचे की थीं और एक सबसे ऊपर मिली। लोअर बर्थ पर शेफाली और उसकी माताजी आसीन हो गईं। विपरीत दिशा वाली सबसे ऊपर की बर्थ पर करुणाकर सोया। किंतु उसकी आँखों में नींद कहाँ थी. वह सारी रात शेफाली को देखता रहा। उधर शेफाली भी नज़रें उठाकर बार-बार उसे देख रही थी। दोनों को बिछड़ने का ग़म सता रहा था। माताजी बेफ़िक्र सो रही थीं।
दस–बारह घंटे कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। अचानक झटके के साथ जब ट्रेन पटना जंक्शन पर रुकी, तब दोनों को होश आया।
उतरने के बाद एक टैक्सी में सवार होकर तीनों घर की ओर चले। चूँकि करुणाकर का घर भी उसी शहर में था, इसलिए घर जाना उसका फ़र्ज़ था। शेफाली और माताजी से विदा लेने के लिए जब वह उतरा तो उसने शेफाली के नाम की एक चिट उसके घर के गेट में फँसा दी। उसे लगा कि शेफाली इसे देख रही है और उठा लेगी, लेकिन शेफाली ने नहीं देखा।
जब उसके पिताजी गेट बंद करने आए तो उनके हाथ वह चिट लग गई। वे असमंजस में पड़ गए कि यह किसने दी। खोलकर देखा तो वह एक भरा हुआ ख़त था, जिसमें लिखा था
“शेफाली, तुम मुझसे दूर हो रही हो, पर दिल के क़रीब हो। मैं अंदर ही अंदर तुमसे प्यार करता रहा, किंतु इज़हार न कर सका। मुझे विश्वास है कि तुम भी मुझसे प्यार करती हो, बोलती नहीं हो। मैं तुम्हें जीवन-संगिनी बनाना चाहता हूँ। जवाब देना।
—करुणाकर”
इसे पढ़कर शेफाली के पिता आग-बबूला हो गए। माताजी को जब पता चला तो वे भी क्रोधित हो उठीं। दोनों शेफाली को भला-बुरा कहने लगे। माँ ने तो कई चाँटे भी लगा दिए। साथ ही कहा-“तुम्हारा उसके साथ लगन नहीं हो सकता। वह हमारी जात-बिरादरी का नहीं है। अपने ख़ानदान पर हम लोग दाग़ नहीं लगाने देंगे। अगर अपने प्यार की ख़ातिर एक भी क़दम उठाया तो हमारा मरा मुँह देखेगी। तेरे भीतर उस छोरे के लिए थोड़ा भी प्रेम है तो भूल जा। अगर तूने ऐसा नहीं किया तो हमें कोई ठोस क़दम उठाना पड़ेगा।”
किशोरी शेफाली डर गई। अपने अभिभावकों का विरोध वह कर न सकी। इतनी परिपक्व भी तो नहीं थी। ज़िंदगी का पहला प्यार था. क्या इतना आसान होता है उसे भूलना? फिर भी माता-पिता की ख़ुशी के लिए उसने आश्वासन दिया कि वह करुणाकर को भूल जाएगी। जिस प्यार का अभी बीज ही पड़ा था, अंकुरित होना बाकी था. उसे समाज और संस्कारों के लिए दबा दिया गया।
बहुत ही खूबसूरत और मासूम कहानी सच है पहला प्यार कभी नहीं भूल सकते
बहुत सुंदर कहानी 👌
कुछ कहानियाँ यूँ ही अधूरी रह जाती है, बहुत अच्छी कहानी 👌