प्रेम शाप है….

हरों का सौंदर्यीकरण
कितने ही नदी-नालों
पहाड़-जंगलों को निगल गया
परंतु फिर भी
इनकी क्षुधा से अछूती हैं
खंडहरनुमा वीरान शापित इमारतें

तो क्या कुछ शाप, वरदान सिद्ध हुए!

किवंदंतियों में सुना है
कि प्रेम भी एक शाप है
संभवतः इसलिए ही वह
चिरस्थायी है

ये सूखी नदियाँ प्राचीन इमारतें
हृदय में
बड़े गहरे उतर जाती हैं
मानो किसी पूर्व जन्म में
हमने एक-दूसरे को जीया हो
और यह छद्म प्रेम
शापित होते हुए भी
रह-रहकर मुझे पुकारता है

मेंरे अधर तप्त हो
मरु में खोई
किसी नदी की कहानी कहते हैं

तुम्हारी देह सूरज हो चली है

और प्रेम वही सांकेतिक मरीचिका है।

सुनीता डी.प्रसाद, प्रसिद्ध लेखिका

2 thoughts on “प्रेम शाप है….

  1. शहरीकरण , नये घरों के सृजन ने पुराने घरों , पर्वतों और नदियों को अकेला छोड़ दिया ।
    इस पीड़ा को लेखिका ने बहुत सुंदर उकेरा है ।

    ये सूखी नदियाँ प्राचीन इमारतें
    हृदय में

    बड़े गहरे उतर जाती हैं
    मानो किसी पूर्व जन्म में
    हमने एक-दूसरे को जीया हो
    और यह छद्म प्रेम
    शापित होते हुए भी
    रह-रहकर मुझे पुकारता है

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